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86. प्रभु के लिए भाव

प्रभु केवल हमारा प्रेम भाव देखते हैं और प्रेम के कारण रीझ जाते हैं । कभी-कभी प्रभु प्रेम की प्रबलता देखने पर अटपटी बातों पर भी रीझ जाते हैं । एक महिला थी जो प्रभु की भक्त थी और प्रभु की खूब सेवा-पूजा करती थी । वह प्रभु को नित्य याद करती रहती थी । एक बार उसे दोपहर में ही हिचकी आने लगी और कुछ देर में उसकी बेटी ससुराल से उससे मिलने आ पहुँची । महिला ने हिचकी की बात बताई तो उसकी बेटी ने कहा कि मैं ही तुम्हें याद कर रही थी इसलिए तुम्हें हिचकी आ रही थी । बेटी मिलकर वापस चली गई । महिला सोच में पड़ गई कि मैं तो प्रभु को आठों याम याद करती रहती हूँ तो प्रभु को भी हिचकी आती होगी और तकलीफ होती होगी । महिला ने निश्चय किया कि प्रभु को तकलीफ न हो इसलिए आज से मैं प्रभु को याद नहीं करूंगी । प्रभु उस महिला की इस बात से रीझ गए कि प्रभु को तकलीफ न हो इसकी कितनी चिंता महिला को है । प्रभु ने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया और अपने में लीन करके अपने धाम ले गए ।

85. प्रभु के लिए प्रेम भाव

प्रभु प्रेम भाव को देखते हैं और अगर प्रभु के लिए लिया नियम कभी टूट भी जाता है तो प्रभु उसकी पूर्ति स्वयं करते हैं । हमारा नियम अगर एक दिन के लिए किसी कारणवश टूट भी जाए पर अगर भाव खंडित नहीं हुआ तो प्रभु उस भाव को स्वीकारते हैं । एक सेठजी का नियम था कि रोज शाम को मंदिर जाकर प्रभु को दो लड्डू भोग लगाकर अर्पित करना । नियम का उन्होंने जीवनभर निर्वाह किया और कभी खंडित नहीं होने दिया । एक बार व्यापार के लिए बाहर गए हुए थे और शाम को बड़ी तेज वर्षा के कारण पानी भरने के कारण अपने गांव नहीं लौट पाए । शाम को प्रभु के लिए लड्डू लेकर मंदिर जाना था वह नियम आज टूटने वाला था । उनके मन में बहुत वेदना हुई और उन्होंने मन-ही-मन लड्डू प्रभु को अर्पण किया । वे जब गांव पहुँचे और दूसरे दिन सुबह मंदिर क्षमा मांगने गए तो मिठाई की दुकान वाले ने उन्हें आवाज देकर बुलाया । उस दुकानदार ने कहा कि आप कल शाम के दो लड्डू के पैसे बाकी छोड़कर गए हैं । सेठजी को समझते देर न लगी कि प्रभु ने स्वयं आकर लड्डू लेकर भोग लगा लिया और उनके नियम को टूटने नहीं दिया ।

84. हीरा और कांच

  हमारा दुर्भाग्य होता है कि हम अधिकतर लोगों की तरह कलियुग में प्रभु प्राप्ति का लक्ष्य, जो कि हीरा तुल्य है, उसे छोड़कर संसार के विषयों और भोगविलास में लिप्त रहते हैं । इस तरह हम अपने मानव जीवन के उद्देश्य से चूक जाते हैं । एक संत थे जिनके पास एक महिला गई जो कि बड़ी भजनानंदी थी । महिला ने संत से कहा कि मेरे पति बिल्कुल नास्तिक हैं , उनका उद्धार कैसे होगा ? संत ने युक्ति से काम लिया और कहा कि शाम को भिक्षा के लिए मैं तुम्हारे घर आऊँगा और प्रभु कृपा करेंगे तो तुम्हारे पति का मन परिवर्तित हो जाएगा । शाम को संत उस महिला के घर पहुँचे और उसके नास्तिक पति को देखते ही दंडवत प्रणाम किया । पति भौचक्का रह गया कि संत ने क्यों प्रणाम किया ? पूछा तो संत बोले कि तुम बड़े त्यागी हो इसलिए मैंने तुमको प्रणाम किया है । अपनी बात को समझाते हुए संत बोले कि मैंने तो सांसारिक भोग विलास, जो कांच तुल्य है उसका त्याग करके भगवत् प्राप्ति, जो हीरा तुल्य है उसके लिए श्रम किया है । कांच को त्यागकर ही रे को सभी पाना चाहते हैं । संत ने आगे उस नास्तिक व्यक्ति से कहा कि तुमने तो हीरा छोड़कर कांच को पाया यानी प्...

83. प्रभु द्वारा सब संभव

  प्रभु के शब्दकोश में असंभव शब्द ही नहीं है । प्रभु सभी से सब कुछ करा सकते हैं । इसकी एक बहुत सुंदर कथा एक संत सु ना ते थे । एक गांव में एक बुढ़िया रहती थी जो प्रभु की बड़ी भक्त थी । उसका पूरा दिन सेवा-पूजा में ही जाता था । प्रारब्धवश घर में काफी सदस्य थे और घर में गरीबी थी । कभी-कभी एक-दो दिन भोजन की व्यवस्था नहीं होती थी । एक बार ऐसा ही हुआ तो बुढ़िया ने मंदिर में सत्संग सुनने के बाद संत से कहकर घोषणा करवा दी कि प्रभु किसी को कृपा करने मदद के रूप में भेजें । एक सेठजी का मुनीम सत्संग में आया था उसने जाकर यह बात दूसरे दिन अपने सेठजी को कही । सेठजी पक्के नास्तिक थे और भगवान को नहीं मानते थे । उन्होंने मजाक करने के लिए अपने मुनीम को कहा कि खूब सारा राशन उस बुढ़िया को देकर आओ और कहना कि यह भगवान ने नहीं बल्कि शैतान ने भिजवाया है । मुनीम आज्ञा पालन करने हेतु चला गया । बुढ़िया ने राशन लिया, भोजन बनाया और सभी परिवारवालों को खिलाया । मुनीम ने कहा कि आप पूछेंगी नहीं कि राशन किसने भेजा है ? बुढ़िया ने बड़ा मार्मिक और हृदयस्पर्शी उत्तर दिया कि मेरे प्रभु ने एक शैतान को माध्यम बनाकर मेरा म...

82. प्रभु नाम की महिमा

अंतकाल में प्रभु की स्मृति हो जाए तो यह सभी साधनों का फल होता है क्योंकि प्रभु स्मृति के कारण जिसका अंत सुधर गया उसका जन्म स्वतः ही सुधर गया । सभी साधन जीवनकाल में इसलिए किए जाते हैं कि अंत समय प्रभु का स्मरण हो जाए और हम जन्म-मृत्यु के चक्र से, संसार के आवागमन के चक्र से छूटकर प्रभु के श्रीधाम पहुँच जाए । एक संत एक कथा सुनाते थे । एक सेठजी को एक बहेलिए ने एक वैष्णव के घर में पाला हुआ तोता बेचा । तोता हरदम राम-राम, गोविंद-गोविंद कहता था । सेठजी को तोते से प्रेम हो गया और उन्होंने भी अनायास तोते के सामने राम-राम गोविंद-गोविंद कहने की आदत डाल ली । ऐसा करते-करते बहुत वर्ष बीत गए । सेठजी बूढ़े हो गए । मृत्यु बेला पर सेठजी को यमदूत दिखे तो तोता उसी समय बोल पड़ा राम-राम । सेठजी ने भी कहा राम-राम और प्रभु के पार्षद तुरंत आ गए । प्रभु के पार्षद सेठजी को प्रभु के धाम लेकर चले गए । यमदूतों को खाली हाथ लौटना पड़ा । अंत बेला पर प्रभु का नाम लेने का फल यह होता है कि वह हमें प्रभु के श्रीधाम की प्राप्ति करवा देता है । इसलिए ही कहा गया है कि नाम जप निरंतर करते रहें क्योंकि कौन-सी श्‍वास हमारी आखि...

81. भक्ति का दीप

  भक्ति का दीप जीवन में जलाना चाहिए । इससे हमारा मानव जीवन कृतार्थ होता है और प्रभु प्रसन्न होते हैं । मानव जीवन की अंतिम उपलब्धि भक्ति ही है । जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ भक्ति है । एक संत एक कथा सुनाते थे   । एक राजा ने अपने तीन पुत्रों को सौ - सौ स्वर्ण मुद्रिकाएं दी और कहा कि अपने-अपने महल को भर दो । एक ने शराब पी कर मुद्रिकाएं खत्म कर दी , दूसरे ने शहर के कचरे से महल को भर दिया और तीसरे ने दीपक जलाकर पूरा महल प्रकाश से भर दिया । राजा ने तीसरे बेटे से प्रसन्न होकर उसे युवराज नियुक्त किया । अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो राजा प्रभु हैं और संतानें हम सब हैं । महल हमारा शरीर है । पहले राजकुमार की तरह कुछ लोग खाओ-पियो और मौज करो की जिंदगी में अपना जीवन व्यर्थ कर देते हैं । दूसरे राजकुमार की तरह कुछ संसार की व्यर्थ गंदगी से अपना जीवन भर देते हैं । पर तीसरे राजकुमार की तरह लायक व्यक्ति भक्ति के दीपक से अपने जीवन को जगमगा कर उसे सफल कर लेता है ।

80. रथ की बागडोर

अपने जीवन रथ की बागडोर प्रभु को सौंप देनी चाहिए । इससे हमारा पूरा-का-पूरा दायित्व प्रभु का हो जाता है । प्रभु हमारे रथ की बागडोर संभाल लेते हैं तो हमें जीवन में विजयश्री मिलती है और हमारा जीवन सफल होता है । जो जीव सच्चा भक्त होता है वह अपने जीवन रथ की डोर प्रभु को सौंप के रखता है । ऐसे व्यक्ति द्वारा कभी कोई गलत निर्णय नहीं होता । महाभारत युद्ध का प्रसंग देखें । श्री अर्जुनजी ने अपने रथ की बागडोर प्रभु को सौंप रखी थी । इतनी बड़ी प्रभु की नारायणी सेवा को ठुकराकर बिना शस्त्र उठाने का प्रण किए प्रभु को श्री अर्जुनजी ने अपने पक्ष में रखा । कौरव से ना में महार थियों की फौज थी । श्री अर्जुनजी से कहीं ज्यादा बलशाली और इच्छा मृत्यु के वरदान प्राप्त महारथी श्री भीष्म पितामह थे । गुरु द्रोणाचार्यजी से तो श्री अर्जुनजी ने धनुर्विद्या सीखी थी, वे भी विपक्ष में थे । महाबली कर्ण धर्म और कर्म में बहुत श्रेष्ठ थे । ये सभी योद्धा हार गए और पांड वों की विजय हुई क्योंकि श्री अर्जुनजी ने युद्ध से पहले ही अपने जीवन रथ की डोर प्रभु श्री कृष्णजी के श्रीहाथों में सौंप दी थी । हमें भी इसी तरह अपने जीवन...

79. प्रभु में विश्वास

प्रभु में विश्वास और श्रद्धा रखकर प्रभु को अर्पण करके हम कुछ भी पाते हैं तो वह वस्तु प्रसाद बन जाती है और वह हमारा मंगल और कल्याण ही करती है । एक संत प्रभु की भक्ति करते थे और प्रभु को अर्पण करके ही कुछ खाते-पीते थे । एक बार गांव की एक दुकान पर आए और कुछ नमक मांगा जिसके साथ भिक्षा में मिली रोटी का भोग प्रभु को लगाकर उन्हें पा लेना था । सेठजी दुकान पर नहीं थे तो उनके बेटे ने सफेद दिखने वाला एक पाउडर नमक समझकर दे दिया जो कीटाणु मारने का जहरीला पाउडर था । संत ने उसका प्रभु को भोग लगाया और जैसे ही पाने बैठे सेठजी आ गए । बेटा वह डब्बा बंद कर ही रहा था कि सेठजी की नजर पड़ी, पूछा तो दंग रह गए कि मेरे बेटे ने जहरीला पदार्थ संत को दे दिया । उन्होंने तुरंत संत को कहा कि इसे मत खाएं क्योंकि यह जहरीला है । संत ने बड़े भाव से कहा कि अब तो वे प्रभु को भोग लगा चुके हैं और प्रसाद का त्याग नहीं किया जा सकता । प्रभु के विश्वास पर उन्होंने भोग आरोग लिया । दो-तीन घं टे बी ते और सेठजी संत के साथ-साथ रहे कि कहीं उल्टी हुई और बीमार पड़े तो तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएंगे पर संत स्वस्थ थे । जहाँ संत रहा कर...

78. जैसा चिंतन वैसा फल

हम जैसा चिंतन करते हैं हमारा मन भी वैसा ही बनता जाता है और हमें फल भी उसी अनुरूप मिलता है । इसलिए चिंतन सदैव भगवत् विषय का और अच्छाइयों का ही होना चाहिए तभी हमारा कल्याण और मंगल होगा । सतयुग की कथा है । एक गांव के बाहर एक साधु झोपड़ी में रहता था और एक नृत्यांगना अपने घर में रहती थी । साधु भजन और पूजन तो करता था पर नृत्यांगना के भोग-विलास, सुख-संपत्ति का चिंतन करता रहता था । साधु के मन में कई बार पछतावा होता था कि उसने विरक्ति का मार्ग लेकर गलती की और उसे भी संसार का सुख लेना चाहिए था । दूसरी तरफ नृत्यांगना रोज सोचती थी कि लोगों को रिझाने और पैसा कमाने का धंधा छोड़कर साधु की तरह अपना जीवन भजन और पूजन में लगाना चाहिए था । दोनों का जब शरीर छूटा और दोनों का हिसाब विचित्र ढंग से हुआ । क्योंकि साधु ने शरीर से भजन और पूजन किया था इसलिए गांव वालों ने उनकी समाधि बनाई । नृत्यांगना ने शरीर से बुरा कृत्य किया था तो उसका अंतिम संस्कार किसी ने नहीं किया और गिद्ध और जानवर उसके शरीर को खा गए । पर चूंकि   नृत्यांगना ने मन से भजन और पूजन का संकल्प किया था उसे मानव देह में एक भजनानंदी ब्राह्मण ...

77. जैसी करनी वैसी भरनी

प्रभु जिसकी जैसी रुचि होती है उस अनुसार ही उसे देते हैं । किसी की संसार में रुचि होती है तो उसे संसार देते हैं पर जिसकी भक्ति में रुचि है उसकी भक्ति परिपक्व हो, ऐसा विधान रचते हैं ।   देवों के देव प्रभु श्री महादेवजी की एक मार्मिक कथा एक संत सु ना ते थे । एक बार भ्रमण करते हुए भगवती पार्वती माता के साथ प्रभु श्री महादेवजी पृथ्वीलोक आए । पहले एक कंजूस सेठ के घर साधु वेश बनाकर गए और सौ ग्राम दूध अभिषेक के लिए मांगा । सेठ ने मना कर दिया और बुरा भला कहा तो प्रभु श्री महादेवजी ने घर से बाहर आकर उसे आशीर्वाद दिया कि उस सेठ की संपत्ति सौ गुना बढ़ जाए । भगवती पार्वती माता ने आश्चर्य किया पर चुप रही । फिर प्रभु और माता साधु वेश में एक भजनानंदी गरीब व्यक्ति के पास गए । उसके पास एक गाय थी और उसकी माता थी और वह झोपड़ी में रहता था । उस गरीब ने प्रभु और माता का स्वागत किया और दूध दिया । प्रभु श्री महादेवजी बाहर आकर बोले कि इसका अपनी गा य और माता से वियोग हो जाए । अब भगवती पार्वती माता से रहा नहीं गया । उन्होंने प्रभु से पूछा कि यह कैसी श्रीलीला है । प्रभु श्री महादेवजी ने कहा ...

76. सबका पोषण प्रभु से

प्रभु ही सबका पोषण करते हैं । प्रभु निमित्त किसी को भी बनाते हैं पर पीछे से करने वाले तो केवल और केवल प्रभु ही होते हैं । प्रभु थलचर, जलचर, नभचर और वनस्पति सभी का पोषण करते हैं और ऐसे अनंत कोटि ब्रह्मांड के जीवों का रोजाना पोषण करते हैं । एक बार एक राज्य में अ काल पड़ा । वहाँ का राजा ब ड़े दयालु स्वभाव का था । उसने राजकोष के द्वार खोल दिए और सभी प्रजा को अ काल की आपदा में राहत दी । उसे इसका अभिमान हो गया कि उसके कारण कितने लोगों का पोषण हुआ । उस राजा के गुरुजी ने यह भां प लिया और राजा को लेकर एक जंगल में गए जो उसके राज्य की सीमा के भीतर था । वहाँ एक बड़ी शिला को हटाया तो एक  हृष्ट-पुष्ट  मेंढक बैठा था । गुरुजी ने राजा से पूछा कि क्या तुमने इसका भी अपने खजाने से पोषण किया ? राजा अपने गुरुजी का इशारा तुरंत समझ गया और लज्जित हुआ । गुरुजी ने कहा कि असंख्य जीव, जंतु, कीड़े, मकोड़े से लेकर बड़े-बड़े जीव जो जंगल में रहते हैं उनका नित्य पोषण प्रभु ही करते हैं । राजा ने भी जो राजकोष खोलकर और जनता को धन सामग्री बां टी वह भी प्रभु प्रेरणा से ही संभव हो सका । राजा तो निमित्त मात्र ह...

75. अनीति का धन

अनीति से कमाया धन अपने साथ बहुत विकार लेकर आता है   । वह पूरी तरह से अनर्थ करने में सक्षम होता है । इसलिए सात्विक धन जो धर्मयुक्त है उसे ही अर्जित करना चाहिए । पुराने समय की बात है । एक जौ हरी एक गांव से दूसरे गांव जा रहा था । रास्ते में एक वृक्ष के नीचे खाना खाने रुका और उसका थैला जिसमें बहुमूल्य रत्न, हीरे और स्वर्ण मोहरे थी वह गलती से वहीं छूट गया । एक संत अपने शिष्य के साथ उधर से निकले । शिष्य की नजर उस धन पर पड़ी । उसने कहा कि इसे ले लेते हैं और सत्कर्म जैसे साधु सेवा, भंडा रे आदि में लगाते हैं तो वर्षों तक यह धन चलेगा । संत ने कहा कि यह अनीति का धन होगा इसलिए अनर्थ ही करेगा । किसी दूसरे का कमाया धन हमारे पास चोरी के रूप में अनीति से आएगा तो वह हमारा बिगाड़ ही करेगा । संत ने शिष्य को शिक्षा देने के लिए एक युक्ति की । वे दोनों एक पेड़ के पीछे छुप गए और संत ने कहा कि देखो आगे क्या होता है । तभी राजा के चार सिपाही घोड़े पर बैठकर उधर से गुजरे । उन्होंने धन देखा तो उनकी नियत बिगड़ गई । उन्होंने आपस में बात की कि राजकोष में जमा करने के बजाए हम चारों इसे आपस में बांट लेते हैं । ...

74. प्रभु के लिए सब संभव

कुछ कार्य जगत में होने वाले होते हैं, कुछ का र्यों के होने में संदेह होता है क्योंकि वे दुर्गम होते हैं और कुछ कार्य पूर्णतया असंभव होते हैं । एक संत समझाते थे कि प्रभु के लिए कुछ भी करना पूर्णतया संभव है । जो कार्य जगत में होने वाले होते हैं वे प्रभु द्वारा हमारे लिए पूर्ण करवाए जाते हैं, जैसे दुकान या व्यापार का सफलतापूर्वक चलना या बेटे या बेटी का उचित समय उचित वर या वधु से विवाह होना । कुछ कार्य होने में संदेह होता है क्योंकि वे दुर्गम होते हैं पर वे भी प्रभु कृपा करके पूर्ण करवाते हैं जैसे किसी भयानक बीमारी से बचाना जिसके लिए डॉक्टर ने जवाब दे दिया, वह भी रोगी प्रभु कृपा से स्वस्थ हो जाते हैं और बच जाते हैं । कुछ कार्य असंभव होते हैं वह भी प्रभु कृपा से प्रभु संपन्न करवाते हैं, उदाहरण स्वरूप किसी को पुत्र योग ही नहीं है और फिर भी प्रभु कृपा करते हैं और उसके घर संतान का जन्म होता है । इसलिए संत कहते हैं कि जो कार्य जगत में होने वाले होते हैं वे तो प्रभु करते ही हैं, जो कार्य दुर्गम और कठिन होते हैं वे भी प्रभु करते हैं और जो पूर्णतया असंभव कार्य होते हैं वे भी प्रभु सफलता से अंज...

73. कर्मों का फल

प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में अपने श्रीवचन में साफ-साफ कहा है कि जो कर्म हमने किया नहीं उसका फल हमें भोगना पड़ेगा नहीं और जो कर्म हमने किए हैं उसके फल हमें निश्चित भोगने पड़ेंगे । इसलिए संतों ने कहा है कि कोई इस जन्म में हमें दुःख दे रहा है तो वह मात्र वे दुःख पहुँचा रहा है जो हमारे पूर्व कर्मों ने तैयार किए हैं । एक संत एक कथा सुनाते थे । एक व्यक्ति एक फल की दुकान में गया और सभी सड़े गले फलों का सौदा किया, कीमत अदा की और फलवाले के पास ही स्थित उसके घर में पहुँचाने के लिए कहा । फलवाले ने कुछ समय बाद अप ने कर्मचारी के साथ सड़े गले फल उस व्यक्ति के दिए पत्ते पर उसके घर पर भिजवा दिए । जैसे ही सड़े गले फल पहुँचे वह व्यक्ति फलवाले के कर्मचारी से झगड़ने लगा कि इतने सड़े गले फल लाए हो । कर्मचारी ने जवाब दिया कि फल का चयन अपने ही किया था, मेरा कार्य तो आपके चयन किए फल को लाकर आपको देना है । मेरा कोई दोष नहीं । ऐसे ही हमने पूर्व जन्मों में पाप कर्म किए, उसका जो विपरीत फल है उसे कोई रिश्तेदार, मित्र, संबंधी हमें इस जन्म में दुःख के रूप में लाकर देता है । वह माध्यम बनता है ठीक उस फलवाले के...

72. संत स्वभाव

भक्ति के कारण भगवान से जुड़े होने के कारण सद्गुणों की प्रधानता संतों और भक्तों में पाई जाती है । यह उनके ऊपर प्रभु की कृपा प्रसादी होती है कि उनका स्वभाव ऐसा होता है जो प्रभु को प्रिय लगे । संसारी का स्वभाव ऐसा होता है जो उसके परिवार को भी प्रिय नहीं लगता, प्रभु को लगना तो बहुत दूर की बात है । एक संत सरोवर के जल में उतरकर आधे शरीर को जलमग्न करके मंत्र पाठ कर रहे थे । पास ही एक संसारी व्यक्ति सरोवर में नहा रहा था । संत को एक बिच्छू ने हाथों में डंक मारा तो उनका ध्यान गया कि बिच्छू सरोवर के जल में डूब रहा है । वे उसे पकड़कर सरोवर के बाहर छोड़ने का प्रयत्न करने लगे । जैसे ही संत अपने हाथों से बिच्छू को पकड़ते वह डंक मारता और संत के हाथों से छूट जाता । संत फिर उसे पकड़ने की कोशिश करते ताकि वे उसे सरोवर के पानी से निकालकर सुरक्षित भूमि में पहुँचा सके । बिच्छू फिर पकड़ने पर डंक मारता और संत के हाथ से छूट जाता । आखिरकार संत ने दोनों हाथों से बिच्छू को पकड़कर डंक के दर्द की परवाह किए बिना उसे सरोवर से बाहर निकाल दिया । सरोवर में जो व्यक्ति नहा रहा था वह यह पूरा नजारा देख रहा था । उसने संत से...

71. प्रभु पर विश्वास

मनुष्य के अलावा जो पशु पक्षी भी प्रभु पर विश्वास करते हैं उनका अमंगल कभी नहीं होता । यह शाश्वत सिद्धांत है । एक संत एक कथा सुनाते थे । एक नीम के पेड़ पर ढेर सारे कौवे रहते थे । एक रात एक तोता आया और कहा कि मौसम खराब है और वह राह भटक गया है इसलिए एक रात का आश्रय दे दें । कौवों ने मना कर दिया और कहा कि यह नीम का पेड़ हमारा है । तोता ने विनम्रता से कहा कि पेड़ तो सभी प्रभु के होते हैं पर कौवों ने उसे भगा दिया । तोता कुछ दूर पर एक आम के वृक्ष में जाकर बैठा । तभी घनघोर वर्षा हुई और बड़े-बड़े ओले गिरने लगे । तोता जिस आम की डाली पर बैठा था वह टूटकर गिरी और तोता डाल टूटने की वजह से डाल की जगह के खोखले स्थान में अपने आप जाकर लुढ़क   गया । ओले की मार से नीम के पेड़ के बहुत सारे कौवे घायल होकर जमीन पर गिर गए, कुछ तो मर भी गए पर तोता खोखली डाल में छिपे होने के कारण बच गया । उसका कुछ भी नहीं बिगड़ा । एक भी ओला या व र्षा की बूंद ने उसे छुआ तक नहीं । तोता रात भर आराम से प्रभु का सिमरन करता रहा और सुबह जब वर्षा रुक गई , ईश्वर को प्रणाम करके आकाश में उड़ गया । भरोसा होने के कारण प्रभु ने उस तो...

70. प्रभु और माता

जब हम प्रभु के साथ माता का भक्ति से आह्वान करते हैं तो दोनों हम पर अनुग्रह करने पधारते हैं पर केवल माता को धन की लालसा से बुलाने पर वे स्थाई रूप से नहीं रुकती । एक संत विनोद में एक कथा सुनाते थे । एक बार प्रभु श्री नारायणजी को भगवती लक्ष्मी माता ने विनोद में कहा कि कलियुग में लोग केवल मेरी ही कामना करते हैं । प्रभु ने कहा कि मेरी कामना करने वाले भी कुछ बिरले भक्त हैं । ऐसे ही एक भक्त की परीक्षा लेने प्रभु और माता पृथ्वी पर आए । प्रभु एक संत का रूप धारण कर अपने भक्त एक सेठजी के घर पहुँचे । सेठजी ने बड़ा स्वागत सत्कार किया और रात को रुकने का आग्रह किया । तभी माता एक बुढ़िया का रूप धारण करके सेठजी के घर पहुँची । सेठजी ने उनका भी सत्कार किया और दोनों को भोजन परोसा । माता ने अपनी झोली से स्वर्ण की थाली, गिलास और कटोरी निकाल कर कहा कि भोजन वे इ समें ही करती हैं और भोजन के बाद दोबारा उन स्वर्ण के बर्तनों का इस्तेमाल नहीं करती और उसे भोजन करवाने करने वाले को दान दे देती है । उनके पास सिद्धि है और अगले भोजन के समय फिर उनकी झोली में स्वर्ण की थाली, गिलास और कटोरी प्रकट हो जाती है । माता ने कहा...

69. प्रभु द्वारा भक्तों को मान

प्रभु अपने से भी ज्यादा मान अपने भक्तों को देते हैं । प्रभु अपने प्रिय भक्तों को जगत से भी बहुत मान दिलाते हैं । जब प्रभु के भक्तों को मान मिलता है तो सबसे ज्यादा प्रसन्नता प्रभु को ही होती है । श्री रामायणजी का एक प्रसंग है । जब प्रभु श्री रामजी वनवास के लिए वन में गए तो उन्‍होंने सभी ऋषियों और मुनियों के आश्रम जाकर उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया । इसी श्रृंखला में प्रभु मुनि श्री भारद्वाजजी के आश्रम गए । जब प्रभु को मनाने के लिए श्री भरतलालजी वन में गए तो वे भी मुनि श्री भारद्वाजजी के आश्रम पर रुके । मुनि श्री भारद्वाजजी ने जो सबके सामने श्री भरतलालजी को कहा वह भक्त की महिमा बताने वाला उल्लेख था । उन्होंने कहा कि मेरे अभी तक के पुण्य, तपस्या और उपासना का फल था कि प्रभु श्री सीतारामजी मुझे दर्शन देने पधारे । पर प्रभु सीतारामजी के दर्शन का फल है जो एक परम भागवत् भक्त श्री भरतलालजी के दर्शन का सौभाग्य उन्हें आज प्राप्त हो रहा है । यह कितना बड़ा मान एक भक्त के लिए है कि प्रभु की अनुकंपा का फल होता है कि एक भक्त का दर्शन हमें जीवन में मिले । यह कितना बड़ा सच है कि प्रभु अपने से भी कितना ...

68. प्रभु का भरोसा

हम अपने बल, बुद्धि और पुरुषार्थ पर भरोसा करते हैं जबकि अगर हमें जीतना है तो प्रभु पर भरोसा करना चाहिए । हमें अपने बल, बुद्धि और पुरुषार्थ को भूलना पड़ता है तब जाकर प्रभु पर सच्चा भरोसा कर पाएंगे । श्री महाभारतजी का प्रसंग है । दुर्योधन के उकसाने पर श्री भीष्म पितामह ने प्रतिज्ञा कर ली कि कल के युद्ध में एक पांडव को मारूंगा । प्रभु को पता था कि इसका अर्थ है श्री अर्जुनजी क्योंकि और कोई पांडव तो उनके सामने टिक ही नहीं सकते । उस रात श्री अर्जुनजी निश्चित होकर खर्राटे लेकर सो गए । प्रभु शिविर में चक्कर लगाकर सोचने लगे कि दोनों तरफ परम भागवत् और भक्त हैं । एक का प्राण टूटेगा या दूसरे की जान जाएगी । प्रभु असमंजस में थे कि किसका पक्ष लूं । तब प्रभु ने युक्ति करते हुए श्री अर्जुनजी को नींद से उठाया और पूछा कि तुम चिंतित नहीं हो भीष्म प्रतिज्ञा सुनकर । श्री अर्जुनजी ने नींद से आँखें खोली और कहा कि केशव, आप मेरी चिंता कर रहे हो ना इसलिए मुझे कोई चिंता नहीं है और मुझे निश्चिंत होकर सोने दो । प्रभु को अपना जवाब मिल गया कि किसका पक्ष लिया जाए । श्री भीष्म पितामह ने अपने बल पर प्रतिज्ञा की थी ...

67. भक्ति के कारण भक्त का प्रभाव

भक्ति के कारण भक्तों और संतों का प्रभाव इतना बड़ा होता है जो सचमुच अद्वितीय है । प्रभु अपने प्रिय भक्तों और संतों के प्रभाव को जग जाहिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ते । एक प्रसंग से भक्ति के कारण भक्तों और संतों की महिमा का हमें पता चलता है । जब भगवती गंगा माता को पृथ्वीलोक में अवतरण के लिए श्री भागीरथजी ने तपस्या करके राजी किया तो माता ने एक प्रश्न पूछा । माता ने पूछा कि प्रभु के श्रीकमलचरणों से निकलने के कारण उनमें पापनाशिनी शक्ति है । पर जब साधारण लोगों के स्नान करने पर वे उनके पाप हरेंगी तो अंत में उनके यहाँ लोगों का जमा हुए संचित पापों का क्षय कैसे होगा । तो श्री भागीरथजी ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया कि जब कोई प्रभु के भक्त और संत भगवती गंगा माता में स्नान करेंगे तो वे उन संचित पापों को भस्म कर उनका क्षय कर देंगे । इस तरह भगवती गंगा माता में कोई पाप टिक ही नहीं पाएंगे । साधारण लोगों के स्नान करने से भगवती गंगा माता में पाप जमा होंगे और भ क्तों के स्नान करने पर वह जमा पाप का क्षय   हो जाएगा । इससे भक्ति और भक्त की महिमा का पता चलता है ।