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Showing posts from November, 2024

86. प्रभु के लिए भाव

प्रभु केवल हमारा प्रेम भाव देखते हैं और प्रेम के कारण रीझ जाते हैं । कभी-कभी प्रभु प्रेम की प्रबलता देखने पर अटपटी बातों पर भी रीझ जाते हैं । एक महिला थी जो प्रभु की भक्त थी और प्रभु की खूब सेवा-पूजा करती थी । वह प्रभु को नित्य याद करती रहती थी । एक बार उसे दोपहर में ही हिचकी आने लगी और कुछ देर में उसकी बेटी ससुराल से उससे मिलने आ पहुँची । महिला ने हिचकी की बात बताई तो उसकी बेटी ने कहा कि मैं ही तुम्हें याद कर रही थी इसलिए तुम्हें हिचकी आ रही थी । बेटी मिलकर वापस चली गई । महिला सोच में पड़ गई कि मैं तो प्रभु को आठों याम याद करती रहती हूँ तो प्रभु को भी हिचकी आती होगी और तकलीफ होती होगी । महिला ने निश्चय किया कि प्रभु को तकलीफ न हो इसलिए आज से मैं प्रभु को याद नहीं करूंगी । प्रभु उस महिला की इस बात से रीझ गए कि प्रभु को तकलीफ न हो इसकी कितनी चिंता महिला को है । प्रभु ने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया और अपने में लीन करके अपने धाम ले गए ।

68. प्रभु का भरोसा

हम अपने बल, बुद्धि और पुरुषार्थ पर भरोसा करते हैं जबकि अगर हमें जीतना है तो प्रभु पर भरोसा करना चाहिए । हमें अपने बल, बुद्धि और पुरुषार्थ को भूलना पड़ता है तब जाकर प्रभु पर सच्चा भरोसा कर पाएंगे । श्री महाभारतजी का प्रसंग है । दुर्योधन के उकसाने पर श्री भीष्म पितामह ने प्रतिज्ञा कर ली कि कल के युद्ध में एक पांडव को मारूंगा । प्रभु को पता था कि इसका अर्थ है श्री अर्जुनजी क्योंकि और कोई पांडव तो उनके सामने टिक ही नहीं सकते । उस रात श्री अर्जुनजी निश्चित होकर खर्राटे लेकर सो गए । प्रभु शिविर में चक्कर लगाकर सोचने लगे कि दोनों तरफ परम भागवत् और भक्त हैं । एक का प्राण टूटेगा या दूसरे की जान जाएगी । प्रभु असमंजस में थे कि किसका पक्ष लूं । तब प्रभु ने युक्ति करते हुए श्री अर्जुनजी को नींद से उठाया और पूछा कि तुम चिंतित नहीं हो भीष्म प्रतिज्ञा सुनकर । श्री अर्जुनजी ने नींद से आँखें खोली और कहा कि केशव, आप मेरी चिंता कर रहे हो ना इसलिए मुझे कोई चिंता नहीं है और मुझे निश्चिंत होकर सोने दो । प्रभु को अपना जवाब मिल गया कि किसका पक्ष लिया जाए । श्री भीष्म पितामह ने अपने बल पर प्रतिज्ञा की थी ...

67. भक्ति के कारण भक्त का प्रभाव

भक्ति के कारण भक्तों और संतों का प्रभाव इतना बड़ा होता है जो सचमुच अद्वितीय है । प्रभु अपने प्रिय भक्तों और संतों के प्रभाव को जग जाहिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ते । एक प्रसंग से भक्ति के कारण भक्तों और संतों की महिमा का हमें पता चलता है । जब भगवती गंगा माता को पृथ्वीलोक में अवतरण के लिए श्री भागीरथजी ने तपस्या करके राजी किया तो माता ने एक प्रश्न पूछा । माता ने पूछा कि प्रभु के श्रीकमलचरणों से निकलने के कारण उनमें पापनाशिनी शक्ति है । पर जब साधारण लोगों के स्नान करने पर वे उनके पाप हरेंगी तो अंत में उनके यहाँ लोगों का जमा हुए संचित पापों का क्षय कैसे होगा । तो श्री भागीरथजी ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया कि जब कोई प्रभु के भक्त और संत भगवती गंगा माता में स्नान करेंगे तो वे उन संचित पापों को भस्म कर उनका क्षय कर देंगे । इस तरह भगवती गंगा माता में कोई पाप टिक ही नहीं पाएंगे । साधारण लोगों के स्नान करने से भगवती गंगा माता में पाप जमा होंगे और भ क्तों के स्नान करने पर वह जमा पाप का क्षय   हो जाएगा । इससे भक्ति और भक्त की महिमा का पता चलता है ।