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Showing posts from July, 2024

86. प्रभु के लिए भाव

प्रभु केवल हमारा प्रेम भाव देखते हैं और प्रेम के कारण रीझ जाते हैं । कभी-कभी प्रभु प्रेम की प्रबलता देखने पर अटपटी बातों पर भी रीझ जाते हैं । एक महिला थी जो प्रभु की भक्त थी और प्रभु की खूब सेवा-पूजा करती थी । वह प्रभु को नित्य याद करती रहती थी । एक बार उसे दोपहर में ही हिचकी आने लगी और कुछ देर में उसकी बेटी ससुराल से उससे मिलने आ पहुँची । महिला ने हिचकी की बात बताई तो उसकी बेटी ने कहा कि मैं ही तुम्हें याद कर रही थी इसलिए तुम्हें हिचकी आ रही थी । बेटी मिलकर वापस चली गई । महिला सोच में पड़ गई कि मैं तो प्रभु को आठों याम याद करती रहती हूँ तो प्रभु को भी हिचकी आती होगी और तकलीफ होती होगी । महिला ने निश्चय किया कि प्रभु को तकलीफ न हो इसलिए आज से मैं प्रभु को याद नहीं करूंगी । प्रभु उस महिला की इस बात से रीझ गए कि प्रभु को तकलीफ न हो इसकी कितनी चिंता महिला को है । प्रभु ने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया और अपने में लीन करके अपने धाम ले गए ।

60. योगक्षेम का महत्व

प्रभु द्वारा श्रीमद् भगवद् गीताजी में भक्तों का योगक्षेम वहन करने का प्रण लिया हुआ है । यह एक अदभुत प्रण है जिसके अलावा हमें प्रभु से कुछ अन्य चाहने की जरूरत ही नहीं होती । प्रभु के इस एक प्रण में सब कुछ समाहित है । योगक्षेम संस्कृत का शब्द है और दो शब्दों से बना है । पहला शब्द है “योग” जिसका अर्थ है कि अप्राप्त की प्राप्ति करना । यानी प्रभु वचन देते हैं कि जो भक्त उ न की शरण में है उसे जब भी, जिस भी चीज की आवश्यकता पड़ेगी प्रभु उसे उपलब्ध कराएंगे । आज से दस वर्ष बाद भी जिस चीज की आवश्यकता है वह हमें आज परिश्रम के बाद भी शायद नहीं मिले पर निर्धारित समय पर प्रभु अवश्य उसे प्रदान करेंगे । दूसरा शब्द “क्षेम” है जिसका अर्थ है कि जो हमें प्राप्त है प्रभु कृपा करके उसकी रक्षा और संरक्षण करेंगे । यह कितना बड़ा आश्वासन है नहीं तो प्रारब्ध राजा को रं क बना देता है । प्रभु के इन दो आश्वासनों के अलावा देखा जाए तो एक भक्त को और कुछ भी नहीं चाहिए । सभी बातें पूर्ण रूप से इन दो आश्वासनों में आ गई । जो अप्राप्त है उसे प्रभु प्राप्त करा देंगे और जो प्राप्त है उसकी प्रभु रक्षा करेंगे । जरूरत है तो ...

59. भक्ति की व्याख्या

भक्ति शब्द का प्रयोग सनातन धर्म के हर शास्त्र और श्रीग्रंथ में बड़ी श्रद्धा के साथ किया गया है । पर भक्ति किसे कहते हैं, सबसे सरल भाषा में हम भक्ति को समझने का प्रयास करते हैं । वैसे तो भक्ति की बहुत बड़ी व्याख्याएं हैं । पर जो सबसे समझने योग्य और सरल है वह यह है कि सबसे सरलतम भाषा में समझे तो प्रभु से पूर्ण रूप से प्रेम करना ही भक्ति है । हम सभी प्रेम करना जानते हैं । कोई सांसारिक रिश्तों से प्रेम करता है, कोई धन से प्रेम करता है, कोई अन्य सांसारिक पदार्थों से प्रेम करता है । हमें बस उस प्रेम की दिशा को मोड़कर और बदलकर प्रभु की तरफ कर देना है यानी प्रभु से प्रेम करना ही भक्ति है । देखिए कितना सरल है भक्ति करना । प्रभु हमसे सिर्फ प्रेम चाहते हैं । प्रभु से पूर्ण प्रेम करने लग जाए तो प्रभु तत्काल संतुष्ट हो जाते हैं और हमारी भक्ति सिद्ध हो जाती है । पर दुर्भाग्यवश इतना सरल होने पर भी हम ऐसा नहीं कर पाते । हमें केवल और केवल प्रेम की दिशा को बदलना है, अन्य कुछ भी नहीं करना क्योंकि प्रेम करना सभी जी वों को आता है । बस वह प्रेम प्रभु से हो जाए तो हम भक्ति में सफल हो जाते हैं ।