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Showing posts from February, 2024

86. प्रभु के लिए भाव

प्रभु केवल हमारा प्रेम भाव देखते हैं और प्रेम के कारण रीझ जाते हैं । कभी-कभी प्रभु प्रेम की प्रबलता देखने पर अटपटी बातों पर भी रीझ जाते हैं । एक महिला थी जो प्रभु की भक्त थी और प्रभु की खूब सेवा-पूजा करती थी । वह प्रभु को नित्य याद करती रहती थी । एक बार उसे दोपहर में ही हिचकी आने लगी और कुछ देर में उसकी बेटी ससुराल से उससे मिलने आ पहुँची । महिला ने हिचकी की बात बताई तो उसकी बेटी ने कहा कि मैं ही तुम्हें याद कर रही थी इसलिए तुम्हें हिचकी आ रही थी । बेटी मिलकर वापस चली गई । महिला सोच में पड़ गई कि मैं तो प्रभु को आठों याम याद करती रहती हूँ तो प्रभु को भी हिचकी आती होगी और तकलीफ होती होगी । महिला ने निश्चय किया कि प्रभु को तकलीफ न हो इसलिए आज से मैं प्रभु को याद नहीं करूंगी । प्रभु उस महिला की इस बात से रीझ गए कि प्रभु को तकलीफ न हो इसकी कितनी चिंता महिला को है । प्रभु ने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया और अपने में लीन करके अपने धाम ले गए ।

50. माया की रस्सी

हम प्रभु की भक्ति क्यों नहीं कर पाते ? क्यों प्रभु के लिए समय नहीं निकाल पाते ? क्योंकि हम संसार के मायाजाल में फंसे हुए हैं । माया ने इस संसार में हमें इस तरह भ्रमित किया है कि हम अपने आपको पूरा फंसा हुआ पाते हैं । हमारे पास संसार करने के बाद प्रभु के लिए समय ही नहीं बचता । एक संत एक कथा सुनाते थे । एक धोबी अपने गधे पर कपड़े लादकर नदी पर कपड़े धोने पहुँचा । वह गधे को बांधने की रस्सी लाना उस दिन भूल गया था । उसने सिर्फ दिखावे के लिए गधे को रोजाना की तरह बांधा । गधा वहीं खड़ा रहा जैसे रोजाना की तरह बंधा हुआ हो । जाने का समय आया तो गधा वहाँ से हिला नहीं । तब धोबी को याद आया कि उसे दिखावे के लिए रस्सी खोलनी पड़ेगी । उसने रस्सी खोलने का नाटक किया तो गधा चल पड़ा । हम भी संसार की खूंटी से इसी तरह दिखावे में बंधे हुए हैं । हम सत्यता में बंधे नहीं हैं पर हमें भान होता है कि हम संसार से बंधे हुए हैं, ठीक उस गधे की तरह । माया ने हमें धोबी की तरह दिखावे में संसार से बांध रखा है ।

49. प्रभु ही करने वाले

प्रभु ही सबका पालन करते हैं । एक धनाढ्य व्यक्ति से लेकर एक चींटी तक का पालन-पोषण प्रभु ही करते हैं । हमें झूठा भ्रम या घमंड नहीं पालना चाहिए कि हमारी वजह से या हमारी कमाई से हमारा परिवार चल रहा है । एक नौकरी करने वाला व्यक्ति था । उसे घमंड था कि वह कमाता है तभी घर चलता है । एक बार पत्नी के साथ बिना मन के सत्संग में गया जहाँ संत कह रहे थे कि सबकी व्यवस्था प्रभु करते हैं । वह व्यक्ति सत्संग के बाद संत से उलझ गया कि मेरे परिवार की व्यवस्था तो मैं स्वयं करता हूँ । पत्नी जब सत्संग के बाद वापस घर चली तो संत ने उस व्यक्ति को रोका और कहा कि एक वर्ष के लिए बिना बताए कहीं चले जाओ और फिर वापस आकर देखना तब पता चलेगा कि सत्य क्या है । वह व्यक्ति बिना किसी को बताए रात को घर से चला गया । दूसरे दिन परिवार वालों ने खोजा तो वह नहीं मिला । फिर प्रभु की प्रेरणा से गांववालों ने उसके बड़े बेटे को एक सेठ के यहाँ नौकरी पर लगा दिया । प्रभु की प्रेरणा से गांववालों ने मिलकर रकम जोड़कर उसकी बेटी का विवाह, जो तय था, उसे अंजाम दिया । एक अन्य जमींदार ने उसके छोटे बेटे की पढ़ाई का खर्चा प्रभु प्रेरणा से उठा लिया ...