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Showing posts from November, 2022

86. प्रभु के लिए भाव

प्रभु केवल हमारा प्रेम भाव देखते हैं और प्रेम के कारण रीझ जाते हैं । कभी-कभी प्रभु प्रेम की प्रबलता देखने पर अटपटी बातों पर भी रीझ जाते हैं । एक महिला थी जो प्रभु की भक्त थी और प्रभु की खूब सेवा-पूजा करती थी । वह प्रभु को नित्य याद करती रहती थी । एक बार उसे दोपहर में ही हिचकी आने लगी और कुछ देर में उसकी बेटी ससुराल से उससे मिलने आ पहुँची । महिला ने हिचकी की बात बताई तो उसकी बेटी ने कहा कि मैं ही तुम्हें याद कर रही थी इसलिए तुम्हें हिचकी आ रही थी । बेटी मिलकर वापस चली गई । महिला सोच में पड़ गई कि मैं तो प्रभु को आठों याम याद करती रहती हूँ तो प्रभु को भी हिचकी आती होगी और तकलीफ होती होगी । महिला ने निश्चय किया कि प्रभु को तकलीफ न हो इसलिए आज से मैं प्रभु को याद नहीं करूंगी । प्रभु उस महिला की इस बात से रीझ गए कि प्रभु को तकलीफ न हो इसकी कितनी चिंता महिला को है । प्रभु ने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया और अपने में लीन करके अपने धाम ले गए ।

20. हर जगह प्रभु को साथ रखें

एक आदत बना लें कि जब भी घर से निकलें तो मन में कहें कि प्रभु साथ चलें और मार्गदर्शन करें ताकि मैं कोई गलती न कर बैठूं । घर में रहें तो प्रभु की  मनोमय (मन में बनाई गई प्रभु की प्रतिमा)  प्रतिमा अपने कार्यस्थल में लगा कर रखें और बीच-बीच में कार्य करते-करते प्रभु को देखें और बात करें कि मैं सही कार्य कर रहा हूँ की नहीं । पांडवों ने प्रभु श्री कृष्णजी को सदैव अपने साथ रखा और प्रभु ने पग-पग पर उनकी रक्षा की ।   सौ कौरव मारे गए पर पांचो पांडव प्रभु कृपा से बच गए । भगवती कुंतीजी , जो पांडवों की माता थी , उन्होंने प्रभु का एहसान मानते हुए सारे प्रसंग गिनाए जब प्रभु ने साक्षात रूप से पांडवों के प्राणों की रक्षा की । इतना बड़ा युद्ध , अपने से विशाल सेना और अनेक महारथियों के होने के बाद भी प्रभु के कारण पांडवों को विजयश्री मिली , वो भी प्रभु के बिना शस्त्र उठाए । पर पांडव एक जगह प्रभु को बिना लिए और प्रभु को बिना पूछे गए और फंस गए । यह प्रसंग था जुए के न्‍योते का जो उनके ताऊजी धृतराष्ट्र ने भिजवाया था । अगर वे प्रभु से पूछते तो प्रभु मना कर देते कि नहीं जाना है । अगर पांडव दुह...

19. भक्ति की अदभुत मिसाल

वैसे तो भक्ति जगत में कई बड़े - बड़े भक्त हर युग में हुए हैं पर चारों युगों में प्रभु श्री हनुमानजी जैसा कोई भक्‍त न कभी हुआ है और न आगे होगा । प्रभु श्री हनुमानजी की श्रीराम भक्ति इतनी श्रेष्ठ है कि प्रभु श्री रामजी ने अपने श्रीमुख से वह अमर वचन कहा कि वे कुछ भी करके , कैसे भी प्रभु श्री हनुमानजी के ऋण से उऋण नहीं हो सकते । प्रभु श्री हनुमानजी की भक्ति की एक बड़ी मार्मिक कथा आपको सुनाते हैं । लंका युद्ध हो चुका था और प्रभु का श्री अयोध्याजी में आगमन और राजतिलक भी हो चुका था । राजतिलक वाली रात चारों भाई और बहुएं और प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु के कक्ष में उपस्थित थे । रात्रि ज्यादा होती देख श्री शत्रुघ्नजी ने सबसे कहा कि भैया और भाभी को विश्राम की जरूरत है , इसलिए सबको चलना चाहिए और उन्हें एकांत देना चाहिए । सब प्रभु और माता को प्रणाम करके चलने लगे पर प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही बैठे रहे । तब श्री शत्रुघ्नजी ने उनसे कहा कि आपको भी चलना चाहिए और प्रभु को एकांत देना चाहिए । प्रभु श्री हनुमानजी ने भगवती सीता माता की तरफ इशारा करके कहा कि माता भी तो बैठी हैं । तो श्र...