प्रभु केवल हमारा प्रेम भाव देखते हैं और प्रेम के कारण रीझ जाते हैं । कभी-कभी प्रभु प्रेम की प्रबलता देखने पर अटपटी बातों पर भी रीझ जाते हैं । एक महिला थी जो प्रभु की भक्त थी और प्रभु की खूब सेवा-पूजा करती थी । वह प्रभु को नित्य याद करती रहती थी । एक बार उसे दोपहर में ही हिचकी आने लगी और कुछ देर में उसकी बेटी ससुराल से उससे मिलने आ पहुँची । महिला ने हिचकी की बात बताई तो उसकी बेटी ने कहा कि मैं ही तुम्हें याद कर रही थी इसलिए तुम्हें हिचकी आ रही थी । बेटी मिलकर वापस चली गई । महिला सोच में पड़ गई कि मैं तो प्रभु को आठों याम याद करती रहती हूँ तो प्रभु को भी हिचकी आती होगी और तकलीफ होती होगी । महिला ने निश्चय किया कि प्रभु को तकलीफ न हो इसलिए आज से मैं प्रभु को याद नहीं करूंगी । प्रभु उस महिला की इस बात से रीझ गए कि प्रभु को तकलीफ न हो इसकी कितनी चिंता महिला को है । प्रभु ने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया और अपने में लीन करके अपने धाम ले गए ।
हम अपना पूरा जीवन सांसारिक धन कमाने में लगा देते हैं । हम इतना धन कमाना चाहते हैं कि हमारे लिए भी और हमारी आने वाली सात पीढ़ियों के लिए भी कम न पड़े । ऐसा करते हुए हम अपने जीवन के एक बहुत बड़े भाग का उपयोग इस हेतु कर देते हैं । प्रभु को प्रसन्न करने वाला और हमारा इक्कीस पीढ़ियों समेत उद्धार करवाने वाला भक्तिरूपी धन कमाना हम भूल जाते हैं । यह इतनी बड़ी चूक होती है कि इस चूक के कारण चौरासी लाख योनियों में फिर से हमें भ्रमण करना पड़ता है । श्री भक्तमालजी में भक्त श्री रांकाजी और भक्ता श्रीमति बांकाजी की कथा आती है । दोनों पति-पत्नी थे और प्रभु के परम भक्त थे । वे भक्ति से संपन्न थे पर धन से संपन्न नहीं थे । एक बार दोनों कहीं जा रहे थे तो भक्त श्री रांकाजी आगे चल रहे थे और रास्ते में उन्हें स्वर्ण मोहरें बिखरी हुई दिखी । वे भक्त थे इसलिए उनके मन में लालच नहीं आया और वे उन मुहरों पर मिट्टी डालने लगे जिससे वे ढक जाए और पीछे आ रही पत्नी की दृष्टि में नहीं आए । उन्हें डर था कि कहीं पत्नी की नियत मोहरें देखकर बदल न जाए । पत्नी ने जब देखा कि उनके पति स्वर्ण मुहरों के ऊपर मिट्टी डाल रहे हैं तो उ...