प्रभु केवल हमारा प्रेम भाव देखते हैं और प्रेम के कारण रीझ जाते हैं । कभी-कभी प्रभु प्रेम की प्रबलता देखने पर अटपटी बातों पर भी रीझ जाते हैं । एक महिला थी जो प्रभु की भक्त थी और प्रभु की खूब सेवा-पूजा करती थी । वह प्रभु को नित्य याद करती रहती थी । एक बार उसे दोपहर में ही हिचकी आने लगी और कुछ देर में उसकी बेटी ससुराल से उससे मिलने आ पहुँची । महिला ने हिचकी की बात बताई तो उसकी बेटी ने कहा कि मैं ही तुम्हें याद कर रही थी इसलिए तुम्हें हिचकी आ रही थी । बेटी मिलकर वापस चली गई । महिला सोच में पड़ गई कि मैं तो प्रभु को आठों याम याद करती रहती हूँ तो प्रभु को भी हिचकी आती होगी और तकलीफ होती होगी । महिला ने निश्चय किया कि प्रभु को तकलीफ न हो इसलिए आज से मैं प्रभु को याद नहीं करूंगी । प्रभु उस महिला की इस बात से रीझ गए कि प्रभु को तकलीफ न हो इसकी कितनी चिंता महिला को है । प्रभु ने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया और अपने में लीन करके अपने धाम ले गए ।
भक्त के बल प्रभु होते हैं । तात्पर्य यह है कि भक्तों के संकल्प में प्रभु का बल युक्त हो जाता है । भक्त अपने बल से हार भी जाए पर प्रभु के बल से जीत जाता है । एक ब्राह्मण के घर बच्चे जन्म के बाद जीवित नहीं रहते थे । श्री अर्जुनजी से जब उस ब्राह्मण ने निवेदन किया तो श्री अर्जुनजी ने उसे वचन दिया कि अगले बच्चे को बचाने का दायित्व उनका है और अगर वे ऐसा नहीं कर पाए तो अग्नि में प्रवेश कर जाएंगे । जब बच्चे के जन्म का समय आया तो श्री अर्जुनजी, जो धनुर्विद्या में पारंगत थे, उन्होंने एक रक्षा कवच अपने बाणों से उस ब्राह्मण के घर के ऊपर बना दिया । बच्चा जन्मा और मर गया । श्री अर्जुनजी सोचते रह गए कि काल, वायु कोई भी इस कवच में प्रवेश नहीं कर सकता, फिर बच्चा कैसे मर गया ? वे अग्नि में प्रवेश की तैयारी करने लगे । तभी उनके रक्षक प्रभु श्री कृष्णजी आ गए । प्रभु ने श्री अर्जुनजी को कहा कि तुमने बच्चे को बचाने के लिए पूरा बल नहीं लगाया । श्री अर्जुनजी को सम झा ते हुए प्रभु बोले कि भक्तों का बल भगवान होते हैं । प्रभु ने श्री अर्जुनजी को कहा कि तुमने प्रतिज्ञा करने से पहले और कवच बनाने से पहले मुझे याद...