Skip to main content

Posts

Showing posts from December, 2025

86. प्रभु के लिए भाव

प्रभु केवल हमारा प्रेम भाव देखते हैं और प्रेम के कारण रीझ जाते हैं । कभी-कभी प्रभु प्रेम की प्रबलता देखने पर अटपटी बातों पर भी रीझ जाते हैं । एक महिला थी जो प्रभु की भक्त थी और प्रभु की खूब सेवा-पूजा करती थी । वह प्रभु को नित्य याद करती रहती थी । एक बार उसे दोपहर में ही हिचकी आने लगी और कुछ देर में उसकी बेटी ससुराल से उससे मिलने आ पहुँची । महिला ने हिचकी की बात बताई तो उसकी बेटी ने कहा कि मैं ही तुम्हें याद कर रही थी इसलिए तुम्हें हिचकी आ रही थी । बेटी मिलकर वापस चली गई । महिला सोच में पड़ गई कि मैं तो प्रभु को आठों याम याद करती रहती हूँ तो प्रभु को भी हिचकी आती होगी और तकलीफ होती होगी । महिला ने निश्चय किया कि प्रभु को तकलीफ न हो इसलिए आज से मैं प्रभु को याद नहीं करूंगी । प्रभु उस महिला की इस बात से रीझ गए कि प्रभु को तकलीफ न हो इसकी कितनी चिंता महिला को है । प्रभु ने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया और अपने में लीन करके अपने धाम ले गए ।

84. हीरा और कांच

  हमारा दुर्भाग्य होता है कि हम अधिकतर लोगों की तरह कलियुग में प्रभु प्राप्ति का लक्ष्य, जो कि हीरा तुल्य है, उसे छोड़कर संसार के विषयों और भोगविलास में लिप्त रहते हैं । इस तरह हम अपने मानव जीवन के उद्देश्य से चूक जाते हैं । एक संत थे जिनके पास एक महिला गई जो कि बड़ी भजनानंदी थी । महिला ने संत से कहा कि मेरे पति बिल्कुल नास्तिक हैं , उनका उद्धार कैसे होगा ? संत ने युक्ति से काम लिया और कहा कि शाम को भिक्षा के लिए मैं तुम्हारे घर आऊँगा और प्रभु कृपा करेंगे तो तुम्हारे पति का मन परिवर्तित हो जाएगा । शाम को संत उस महिला के घर पहुँचे और उसके नास्तिक पति को देखते ही दंडवत प्रणाम किया । पति भौचक्का रह गया कि संत ने क्यों प्रणाम किया ? पूछा तो संत बोले कि तुम बड़े त्यागी हो इसलिए मैंने तुमको प्रणाम किया है । अपनी बात को समझाते हुए संत बोले कि मैंने तो सांसारिक भोग विलास, जो कांच तुल्य है उसका त्याग करके भगवत् प्राप्ति, जो हीरा तुल्य है उसके लिए श्रम किया है । कांच को त्यागकर ही रे को सभी पाना चाहते हैं । संत ने आगे उस नास्तिक व्यक्ति से कहा कि तुमने तो हीरा छोड़कर कांच को पाया यानी प्...