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Showing posts from August, 2024

86. प्रभु के लिए भाव

प्रभु केवल हमारा प्रेम भाव देखते हैं और प्रेम के कारण रीझ जाते हैं । कभी-कभी प्रभु प्रेम की प्रबलता देखने पर अटपटी बातों पर भी रीझ जाते हैं । एक महिला थी जो प्रभु की भक्त थी और प्रभु की खूब सेवा-पूजा करती थी । वह प्रभु को नित्य याद करती रहती थी । एक बार उसे दोपहर में ही हिचकी आने लगी और कुछ देर में उसकी बेटी ससुराल से उससे मिलने आ पहुँची । महिला ने हिचकी की बात बताई तो उसकी बेटी ने कहा कि मैं ही तुम्हें याद कर रही थी इसलिए तुम्हें हिचकी आ रही थी । बेटी मिलकर वापस चली गई । महिला सोच में पड़ गई कि मैं तो प्रभु को आठों याम याद करती रहती हूँ तो प्रभु को भी हिचकी आती होगी और तकलीफ होती होगी । महिला ने निश्चय किया कि प्रभु को तकलीफ न हो इसलिए आज से मैं प्रभु को याद नहीं करूंगी । प्रभु उस महिला की इस बात से रीझ गए कि प्रभु को तकलीफ न हो इसकी कितनी चिंता महिला को है । प्रभु ने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया और अपने में लीन करके अपने धाम ले गए ।

62. प्रभु के श्रीकमलचरण

हम संसार में शांति और आनंद खोजते हैं पर हमें नहीं मिलती क्योंकि जो चीज जहाँ पर नहीं होगी वह वहाँ से कैसे मिलेगी ? जो सामान एक कमरे में नहीं है उसे कितना भी आप खोजिए वह वहाँ पर कभी नहीं मिलेगा । एक संत एक कथा सुनाते थे । जब प्रभु ने सृष्टि ब ना ई तो प्रभु श्री नारायणजी के आदेश से उनके श्रीकमलचरणों से निकलकर ऐश्वर्य, श्री, कीर्ति इत्यादि सभी पृथ्वीलोक में चले गए । भगवती लक्ष्मी माता प्रभु के श्रीकमलचरणों की सेवा कर रही थीं । उन्होंने ध्यान लगाकर देखा कि कुछ तो प्रभु के श्रीकमलचरणों में चिपका रह गया जो पृथ्वीलोक में नहीं गया । ध्यान लगाकर देखने पर ज्ञात हुआ कि शांति और आनंद पृथ्वीलोक में नहीं गए और प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही चिपके रह गए । हम शांति और आनंद संसार में खोजते हैं पर वह तो हमारा मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकने पर ही हमें मिल सक ते  हैं । इसलिए हमें गलत जगह पर यानी संसार में शांति और आनंद को खोजने का प्रयास नहीं करना चाहिए । हमें अपना मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकना चाहिए तो ही हमें प्रसाद रूप में प्रभु से शांति और आनंद की प्राप्ति हो पाएगी ।

61. शरणागति का महत्व

प्रभु की शरणागति का बहुत बड़ा महत्व है । प्रभु की शरण में आने पर कोई विपत्ति हमें परेशान नहीं कर सकती । प्रभु उन सबको शरण देते हैं जो उनकी शरणागति स्वीकार करना चाहते हैं । प्रभु की श्रीमद् भगवद् गीताजी के अठारहवें अध्याय में घोषणा है कि प्रभु की शरण में आने पर प्रभु हमें सभी पापों से मुक्त कर देंगे । दूसरा आश्वासन प्रभु का है कि “चिंता मत करो” क्योंकि प्रभु हमारे संरक्षण के लिए तैयार खड़े हैं । ये दोनों कित ने ब ड़े आश्वासन हैं कि सभी जन्मों-जन्मों के संचित पापों से मुक्त कर देना और सभी चिं ताओं का हरण कर लेना । संत कहते हैं कि दुराचारी-से-दुराचारी भी अगर प्रभु की शरण में आता है और सच्चा पश्चाताप करता है और अपने द्वारा की गई गलती या पाप को जीवन में नहीं दोहराने का संकल्प करता है तो प्रभु तत्काल उसे चिंताओं से निश्चिंत कर पाप मुक्त कर देते हैं और उसका उद्धार कर देते हैं । यह प्रभु की कितनी विलक्षण करुणा, कृपा और दया है ।