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Showing posts from May, 2022

86. प्रभु के लिए भाव

प्रभु केवल हमारा प्रेम भाव देखते हैं और प्रेम के कारण रीझ जाते हैं । कभी-कभी प्रभु प्रेम की प्रबलता देखने पर अटपटी बातों पर भी रीझ जाते हैं । एक महिला थी जो प्रभु की भक्त थी और प्रभु की खूब सेवा-पूजा करती थी । वह प्रभु को नित्य याद करती रहती थी । एक बार उसे दोपहर में ही हिचकी आने लगी और कुछ देर में उसकी बेटी ससुराल से उससे मिलने आ पहुँची । महिला ने हिचकी की बात बताई तो उसकी बेटी ने कहा कि मैं ही तुम्हें याद कर रही थी इसलिए तुम्हें हिचकी आ रही थी । बेटी मिलकर वापस चली गई । महिला सोच में पड़ गई कि मैं तो प्रभु को आठों याम याद करती रहती हूँ तो प्रभु को भी हिचकी आती होगी और तकलीफ होती होगी । महिला ने निश्चय किया कि प्रभु को तकलीफ न हो इसलिए आज से मैं प्रभु को याद नहीं करूंगी । प्रभु उस महिला की इस बात से रीझ गए कि प्रभु को तकलीफ न हो इसकी कितनी चिंता महिला को है । प्रभु ने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया और अपने में लीन करके अपने धाम ले गए ।

08. प्रभु के श्रीकमलचरण

भक्तों को प्रभु के श्रीकमलचरण बहुत प्रिय होते हैं । वे अपना स्थान और अधिकार प्रभु के श्रीकमलचरणों में मानते हैं । वे सदा प्रभु के श्रीकमलचरणों की छत्रछाया में रहना चाहते हैं । प्रभु के श्रीकमलचरणों में रहने से वे निश्चिंत और अभय रहते हैं । प्रभु के श्रीकमलचरणों का सानिध्य हर भक्ति करने वाले भक्तों ने चाहा है और पाया है । इसका सबसे बड़ा उदाहरण स्वयं प्रभु श्री हनुमानजी हैं । जब लंका पर प्रभु ने विजय प्राप्त की और वनवास काल पूर्ण करके श्री अयोध्याजी लौटे तो प्रभु के साथ प्रभु श्री हनुमानजी , श्री सुग्रीवजी , श्री जाम्बवन्तजी , श्री अंगदजी , श्री विभीषणजी और अन्य बहुत सारे प्रमुख वानर वीर श्री अयोध्याजी प्रभु के राज्याभिषेक में शामिल होने के लिए आए । प्रभु का राज्याभिषेक हुआ । कुछ दिन तक सभी प्रभु की सेवा में रुके फिर प्रभु ने सबको आशीर्वाद , भेंट और आदर - सम्मान देकर विदा किया । पर जब प्रभु श्री हनुमानजी की बारी आई तो उन्होंने कहा कि वे प्रभु की सेवा में श्री अयोध्याजी में ही रहना चाहते हैं । प्रभु श्री रामजी और भगवती सीता माता भी मन से यही चाहते थे तो उन्होंने प्रभु श्री ...

07. सौभाग्य और दुर्भाग्य

जीवन में सौभाग्य को भी हम भोगते हैं और दुर्भाग्य को भी हम भोगते हैं । ऐसा क्‍यों होता है कि जीवन में सौभाग्य टिकता नहीं और दुर्भाग्य हमारा पीछा छोड़ता नहीं । सिद्धांत के तौर पर एक बात अगर हम स्वीकार करेंगे तो इसका उत्तर हमें मिल जाएगा । फिर जीवन में सौभाग्य हमारे साथ सदा स्थिर रहेगा और दुर्भाग्य हमारे जीवन में आने की हिम्मत भी नहीं करेगा । सिद्धांत यह है कि प्रभु जिसके जीवन में हैं वहीं सौभाग्य स्थिर है और प्रभु जिसके जीवन में नहीं है वहाँ दुर्भाग्य आकर स्थिर हो जाता है । इसका पौराणिक उदाहरण देखें तो यह तथ्य समझ में आएगा । प्रभु श्री रामजी को जब वनवास मिला और वे श्री अयोध्याजी को छोड़कर वन में गए तो श्री अयोध्याजी में दुर्भाग्य की होड़ लग गई । महाराज श्री दशरथजी का परलोक गमन हुआ । श्री भरतलालजी जब अपने गुरुजी के बुलावे पर अपने ननिहाल से श्री अयोध्याजी आए तो उन्‍हें श्री अयोध्याजी में भयंकर अपशगुन मिले और वह विरान और दुर्भाग्यग्रस्त जान पड़ी । फिर जब प्रभु श्री रामजी वनवास काल पूर्ण कर वापस श्री अयोध्याजी आए और उनका राजसिंहासन पर राज्याभिषेक हुआ तो श्री अयोध्याजी में सौभाग्य की होड़ ...