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Showing posts from June, 2022

86. प्रभु के लिए भाव

प्रभु केवल हमारा प्रेम भाव देखते हैं और प्रेम के कारण रीझ जाते हैं । कभी-कभी प्रभु प्रेम की प्रबलता देखने पर अटपटी बातों पर भी रीझ जाते हैं । एक महिला थी जो प्रभु की भक्त थी और प्रभु की खूब सेवा-पूजा करती थी । वह प्रभु को नित्य याद करती रहती थी । एक बार उसे दोपहर में ही हिचकी आने लगी और कुछ देर में उसकी बेटी ससुराल से उससे मिलने आ पहुँची । महिला ने हिचकी की बात बताई तो उसकी बेटी ने कहा कि मैं ही तुम्हें याद कर रही थी इसलिए तुम्हें हिचकी आ रही थी । बेटी मिलकर वापस चली गई । महिला सोच में पड़ गई कि मैं तो प्रभु को आठों याम याद करती रहती हूँ तो प्रभु को भी हिचकी आती होगी और तकलीफ होती होगी । महिला ने निश्चय किया कि प्रभु को तकलीफ न हो इसलिए आज से मैं प्रभु को याद नहीं करूंगी । प्रभु उस महिला की इस बात से रीझ गए कि प्रभु को तकलीफ न हो इसकी कितनी चिंता महिला को है । प्रभु ने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया और अपने में लीन करके अपने धाम ले गए ।

10. प्रभु नाम की महिमा

प्रभु नाम की महिमा असीम है । जिसको प्रभु नाम पर विश्वास होता है उसके लिए नाम भगवान सब कुछ करते हैं । ऐसा कुछ भी नहीं जो प्रभु का नाम नहीं कर सकता क्योंकि नामी प्रभु ने अपनी समस्त शक्तियों को अपने नाम में स्थापित कर रखा है । इसलिए हमें प्रभु के नाम पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए और हमें नियमित प्रभु का नाम जप करना चाहिए । विपत्ति में तो जरूर करना चाहिए क्योंकि विपत्ति का निवारण इससे ही होता है । एक संत एक कथा सुनाते थे कि एक विदेशी एक बंदूक लेकर बस में सफर कर रहा था । बस एक गांव में रुकी । बस को आधा घंटा रुकना था तो वह विदेशी भी अपनी बंदूक लेकर टहलने के लिए बस से उतर गया । उसने भारत के संतों के विषय में काफी सुन रखा था । वहाँ गांव में उसे एक संत माला जपते हुए मिले । उस विदेशी ने उस संत के पास जाकर पूछा कि यह क्या कर रहे हैं । संत ने माला दिखाकर कहा कि मैं प्रभु का नाम जप रहा हूँ । उस विदेशी ने पूछा कि इससे क्या होता है । संत सच्चे थे और उनके मन में आया कि विदेशी को प्रभु नाम का प्रभाव दिखाना चाहिए । संत ने विदेशी की बंदूक की तरफ इशारा करके पूछा इससे क्या होता है । विदेशी ने तुरंत उस वृक...

09. भक्तों का ऋण

प्रभु को अपने भक्‍त बहुत प्रिय हैं । भक्तों द्वारा प्रभु के लिए किए हुए थो ड़े - से कार्य को प्रभु मेरु पर्वत समान बहुत बड़ा मानते हैं । प्रभु श्री हनुमानजी द्वारा की गई सेवा को तो प्रभु श्री रामजी ने इतना बड़ा माना कि उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि कुछ भी करके वे कभी भी प्रभु श्री हनुमानजी के सेवा ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकते । यह कौन कह रहा है ? यह जगत नियंता प्रभु कह रहे हैं जिनकी भृकुटी के इशारे से ब्रह्मांडों का समूह निर्माण और लय हो जाता है और जिनके संकल्प मात्र से सभी कार्य स्वतः ही सिद्ध हो जाते हैं । श्रीराम दरबार का एक प्रसंग है । प्रभु राजसिंहासन पर भगवती सीता माता के साथ बैठे थे और हरदम की तरह प्रभु के श्रीकमलचरणों की सेवा में प्रभु श्री हनुमानजी बैठे थे । माता ने देखा कि प्रभु को जब भी राज - काज की बातों से समय मिलता वे अपने प्रिय प्रभु श्री हनुमानजी को देखते हैं पर जब प्रभु श्री हनुमानजी अपनी नजरें उठाकर प्रभु से नजर मिलाने के लिए देखते तो प्रभु तुरंत दूसरी तरफ देखने लगते । माता ने दिन भर में ऐसा काफी बार होते देखा । रात्रि को शयनकक्ष में माता ने प्रभु से प...