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75. अनीति का धन

अनीति से कमाया धन अपने साथ बहुत विकार लेकर आता है   । वह पूरी तरह से अनर्थ करने में सक्षम होता है । इसलिए सात्विक धन जो धर्मयुक्त है उसे ही अर्जित करना चाहिए । पुराने समय की बात है । एक जौ हरी एक गांव से दूसरे गांव जा रहा था । रास्ते में एक वृक्ष के नीचे खाना खाने रुका और उसका थैला जिसमें बहुमूल्य रत्न, हीरे और स्वर्ण मोहरे थी वह गलती से वहीं छूट गया । एक संत अपने शिष्य के साथ उधर से निकले । शिष्य की नजर उस धन पर पड़ी । उसने कहा कि इसे ले लेते हैं और सत्कर्म जैसे साधु सेवा, भंडा रे आदि में लगाते हैं तो वर्षों तक यह धन चलेगा । संत ने कहा कि यह अनीति का धन होगा इसलिए अनर्थ ही करेगा । किसी दूसरे का कमाया धन हमारे पास चोरी के रूप में अनीति से आएगा तो वह हमारा बिगाड़ ही करेगा । संत ने शिष्य को शिक्षा देने के लिए एक युक्ति की । वे दोनों एक पेड़ के पीछे छुप गए और संत ने कहा कि देखो आगे क्या होता है । तभी राजा के चार सिपाही घोड़े पर बैठकर उधर से गुजरे । उन्होंने धन देखा तो उनकी नियत बिगड़ गई । उन्होंने आपस में बात की कि राजकोष में जमा करने के बजाए हम चारों इसे आपस में बांट लेते हैं । ...

74. प्रभु के लिए सब संभव

कुछ कार्य जगत में होने वाले होते हैं, कुछ का र्यों के होने में संदेह होता है क्योंकि वे दुर्गम होते हैं और कुछ कार्य पूर्णतया असंभव होते हैं । एक संत समझाते थे कि प्रभु के लिए कुछ भी करना पूर्णतया संभव है । जो कार्य जगत में होने वाले होते हैं वे प्रभु द्वारा हमारे लिए पूर्ण करवाए जाते हैं, जैसे दुकान या व्यापार का सफलतापूर्वक चलना या बेटे या बेटी का उचित समय उचित वर या वधु से विवाह होना । कुछ कार्य होने में संदेह होता है क्योंकि वे दुर्गम होते हैं पर वे भी प्रभु कृपा करके पूर्ण करवाते हैं जैसे किसी भयानक बीमारी से बचाना जिसके लिए डॉक्टर ने जवाब दे दिया, वह भी रोगी प्रभु कृपा से स्वस्थ हो जाते हैं और बच जाते हैं । कुछ कार्य असंभव होते हैं वह भी प्रभु कृपा से प्रभु संपन्न करवाते हैं, उदाहरण स्वरूप किसी को पुत्र योग ही नहीं है और फिर भी प्रभु कृपा करते हैं और उसके घर संतान का जन्म होता है । इसलिए संत कहते हैं कि जो कार्य जगत में होने वाले होते हैं वे तो प्रभु करते ही हैं, जो कार्य दुर्गम और कठिन होते हैं वे भी प्रभु करते हैं और जो पूर्णतया असंभव कार्य होते हैं वे भी प्रभु सफलता से अंज...

73. कर्मों का फल

प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में अपने श्रीवचन में साफ-साफ कहा है कि जो कर्म हमने किया नहीं उसका फल हमें भोगना पड़ेगा नहीं और जो कर्म हमने किए हैं उसके फल हमें निश्चित भोगने पड़ेंगे । इसलिए संतों ने कहा है कि कोई इस जन्म में हमें दुःख दे रहा है तो वह मात्र वे दुःख पहुँचा रहा है जो हमारे पूर्व कर्मों ने तैयार किए हैं । एक संत एक कथा सुनाते थे । एक व्यक्ति एक फल की दुकान में गया और सभी सड़े गले फलों का सौदा किया, कीमत अदा की और फलवाले के पास ही स्थित उसके घर में पहुँचाने के लिए कहा । फलवाले ने कुछ समय बाद अप ने कर्मचारी के साथ सड़े गले फल उस व्यक्ति के दिए पत्ते पर उसके घर पर भिजवा दिए । जैसे ही सड़े गले फल पहुँचे वह व्यक्ति फलवाले के कर्मचारी से झगड़ने लगा कि इतने सड़े गले फल लाए हो । कर्मचारी ने जवाब दिया कि फल का चयन अपने ही किया था, मेरा कार्य तो आपके चयन किए फल को लाकर आपको देना है । मेरा कोई दोष नहीं । ऐसे ही हमने पूर्व जन्मों में पाप कर्म किए, उसका जो विपरीत फल है उसे कोई रिश्तेदार, मित्र, संबंधी हमें इस जन्म में दुःख के रूप में लाकर देता है । वह माध्यम बनता है ठीक उस फलवाले के...

72. संत स्वभाव

भक्ति के कारण भगवान से जुड़े होने के कारण सद्गुणों की प्रधानता संतों और भक्तों में पाई जाती है । यह उनके ऊपर प्रभु की कृपा प्रसादी होती है कि उनका स्वभाव ऐसा होता है जो प्रभु को प्रिय लगे । संसारी का स्वभाव ऐसा होता है जो उसके परिवार को भी प्रिय नहीं लगता, प्रभु को लगना तो बहुत दूर की बात है । एक संत सरोवर के जल में उतरकर आधे शरीर को जलमग्न करके मंत्र पाठ कर रहे थे । पास ही एक संसारी व्यक्ति सरोवर में नहा रहा था । संत को एक बिच्छू ने हाथों में डंक मारा तो उनका ध्यान गया कि बिच्छू सरोवर के जल में डूब रहा है । वे उसे पकड़कर सरोवर के बाहर छोड़ने का प्रयत्न करने लगे । जैसे ही संत अपने हाथों से बिच्छू को पकड़ते वह डंक मारता और संत के हाथों से छूट जाता । संत फिर उसे पकड़ने की कोशिश करते ताकि वे उसे सरोवर के पानी से निकालकर सुरक्षित भूमि में पहुँचा सके । बिच्छू फिर पकड़ने पर डंक मारता और संत के हाथ से छूट जाता । आखिरकार संत ने दोनों हाथों से बिच्छू को पकड़कर डंक के दर्द की परवाह किए बिना उसे सरोवर से बाहर निकाल दिया । सरोवर में जो व्यक्ति नहा रहा था वह यह पूरा नजारा देख रहा था । उसने संत से...

71. प्रभु पर विश्वास

मनुष्य के अलावा जो पशु पक्षी भी प्रभु पर विश्वास करते हैं उनका अमंगल कभी नहीं होता । यह शाश्वत सिद्धांत है । एक संत एक कथा सुनाते थे । एक नीम के पेड़ पर ढेर सारे कौवे रहते थे । एक रात एक तोता आया और कहा कि मौसम खराब है और वह राह भटक गया है इसलिए एक रात का आश्रय दे दें । कौवों ने मना कर दिया और कहा कि यह नीम का पेड़ हमारा है । तोता ने विनम्रता से कहा कि पेड़ तो सभी प्रभु के होते हैं पर कौवों ने उसे भगा दिया । तोता कुछ दूर पर एक आम के वृक्ष में जाकर बैठा । तभी घनघोर वर्षा हुई और बड़े-बड़े ओले गिरने लगे । तोता जिस आम की डाली पर बैठा था वह टूटकर गिरी और तोता डाल टूटने की वजह से डाल की जगह के खोखले स्थान में अपने आप जाकर लुढ़क   गया । ओले की मार से नीम के पेड़ के बहुत सारे कौवे घायल होकर जमीन पर गिर गए, कुछ तो मर भी गए पर तोता खोखली डाल में छिपे होने के कारण बच गया । उसका कुछ भी नहीं बिगड़ा । एक भी ओला या व र्षा की बूंद ने उसे छुआ तक नहीं । तोता रात भर आराम से प्रभु का सिमरन करता रहा और सुबह जब वर्षा रुक गई , ईश्वर को प्रणाम करके आकाश में उड़ गया । भरोसा होने के कारण प्रभु ने उस तो...

70. प्रभु और माता

जब हम प्रभु के साथ माता का भक्ति से आह्वान करते हैं तो दोनों हम पर अनुग्रह करने पधारते हैं पर केवल माता को धन की लालसा से बुलाने पर वे स्थाई रूप से नहीं रुकती । एक संत विनोद में एक कथा सुनाते थे । एक बार प्रभु श्री नारायणजी को भगवती लक्ष्मी माता ने विनोद में कहा कि कलियुग में लोग केवल मेरी ही कामना करते हैं । प्रभु ने कहा कि मेरी कामना करने वाले भी कुछ बिरले भक्त हैं । ऐसे ही एक भक्त की परीक्षा लेने प्रभु और माता पृथ्वी पर आए । प्रभु एक संत का रूप धारण कर अपने भक्त एक सेठजी के घर पहुँचे । सेठजी ने बड़ा स्वागत सत्कार किया और रात को रुकने का आग्रह किया । तभी माता एक बुढ़िया का रूप धारण करके सेठजी के घर पहुँची । सेठजी ने उनका भी सत्कार किया और दोनों को भोजन परोसा । माता ने अपनी झोली से स्वर्ण की थाली, गिलास और कटोरी निकाल कर कहा कि भोजन वे इ समें ही करती हैं और भोजन के बाद दोबारा उन स्वर्ण के बर्तनों का इस्तेमाल नहीं करती और उसे भोजन करवाने करने वाले को दान दे देती है । उनके पास सिद्धि है और अगले भोजन के समय फिर उनकी झोली में स्वर्ण की थाली, गिलास और कटोरी प्रकट हो जाती है । माता ने कहा...

69. प्रभु द्वारा भक्तों को मान

प्रभु अपने से भी ज्यादा मान अपने भक्तों को देते हैं । प्रभु अपने प्रिय भक्तों को जगत से भी बहुत मान दिलाते हैं । जब प्रभु के भक्तों को मान मिलता है तो सबसे ज्यादा प्रसन्नता प्रभु को ही होती है । श्री रामायणजी का एक प्रसंग है । जब प्रभु श्री रामजी वनवास के लिए वन में गए तो उन्‍होंने सभी ऋषियों और मुनियों के आश्रम जाकर उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया । इसी श्रृंखला में प्रभु मुनि श्री भारद्वाजजी के आश्रम गए । जब प्रभु को मनाने के लिए श्री भरतलालजी वन में गए तो वे भी मुनि श्री भारद्वाजजी के आश्रम पर रुके । मुनि श्री भारद्वाजजी ने जो सबके सामने श्री भरतलालजी को कहा वह भक्त की महिमा बताने वाला उल्लेख था । उन्होंने कहा कि मेरे अभी तक के पुण्य, तपस्या और उपासना का फल था कि प्रभु श्री सीतारामजी मुझे दर्शन देने पधारे । पर प्रभु सीतारामजी के दर्शन का फल है जो एक परम भागवत् भक्त श्री भरतलालजी के दर्शन का सौभाग्य उन्हें आज प्राप्त हो रहा है । यह कितना बड़ा मान एक भक्त के लिए है कि प्रभु की अनुकंपा का फल होता है कि एक भक्त का दर्शन हमें जीवन में मिले । यह कितना बड़ा सच है कि प्रभु अपने से भी कितना ...

68. प्रभु का भरोसा

हम अपने बल, बुद्धि और पुरुषार्थ पर भरोसा करते हैं जबकि अगर हमें जीतना है तो प्रभु पर भरोसा करना चाहिए । हमें अपने बल, बुद्धि और पुरुषार्थ को भूलना पड़ता है तब जाकर प्रभु पर सच्चा भरोसा कर पाएंगे । श्री महाभारतजी का प्रसंग है । दुर्योधन के उकसाने पर श्री भीष्म पितामह ने प्रतिज्ञा कर ली कि कल के युद्ध में एक पांडव को मारूंगा । प्रभु को पता था कि इसका अर्थ है श्री अर्जुनजी क्योंकि और कोई पांडव तो उनके सामने टिक ही नहीं सकते । उस रात श्री अर्जुनजी निश्चित होकर खर्राटे लेकर सो गए । प्रभु शिविर में चक्कर लगाकर सोचने लगे कि दोनों तरफ परम भागवत् और भक्त हैं । एक का प्राण टूटेगा या दूसरे की जान जाएगी । प्रभु असमंजस में थे कि किसका पक्ष लूं । तब प्रभु ने युक्ति करते हुए श्री अर्जुनजी को नींद से उठाया और पूछा कि तुम चिंतित नहीं हो भीष्म प्रतिज्ञा सुनकर । श्री अर्जुनजी ने नींद से आँखें खोली और कहा कि केशव, आप मेरी चिंता कर रहे हो ना इसलिए मुझे कोई चिंता नहीं है और मुझे निश्चिंत होकर सोने दो । प्रभु को अपना जवाब मिल गया कि किसका पक्ष लिया जाए । श्री भीष्म पितामह ने अपने बल पर प्रतिज्ञा की थी ...

67. भक्ति के कारण भक्त का प्रभाव

भक्ति के कारण भक्तों और संतों का प्रभाव इतना बड़ा होता है जो सचमुच अद्वितीय है । प्रभु अपने प्रिय भक्तों और संतों के प्रभाव को जग जाहिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ते । एक प्रसंग से भक्ति के कारण भक्तों और संतों की महिमा का हमें पता चलता है । जब भगवती गंगा माता को पृथ्वीलोक में अवतरण के लिए श्री भागीरथजी ने तपस्या करके राजी किया तो माता ने एक प्रश्न पूछा । माता ने पूछा कि प्रभु के श्रीकमलचरणों से निकलने के कारण उनमें पापनाशिनी शक्ति है । पर जब साधारण लोगों के स्नान करने पर वे उनके पाप हरेंगी तो अंत में उनके यहाँ लोगों का जमा हुए संचित पापों का क्षय कैसे होगा । तो श्री भागीरथजी ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया कि जब कोई प्रभु के भक्त और संत भगवती गंगा माता में स्नान करेंगे तो वे उन संचित पापों को भस्म कर उनका क्षय कर देंगे । इस तरह भगवती गंगा माता में कोई पाप टिक ही नहीं पाएंगे । साधारण लोगों के स्नान करने से भगवती गंगा माता में पाप जमा होंगे और भ क्तों के स्नान करने पर वह जमा पाप का क्षय   हो जाएगा । इससे भक्ति और भक्त की महिमा का पता चलता है ।

66. आस्तिक और नास्तिक

सत्कर्म, पूजा, सत्संग और भजन कभी व्यर्थ नहीं जाते । वे हमारे पूर्व के संचित पाप काटते हैं और वर्तमान जीवन में हमारा कल्याण और उद्धार कराते हैं । एक संत एक कथा सुनाते थे । दो दोस्त थे । एक बहुत अमीर पर नशा, जुआ, व्यभिचार   और गलत आचरण करने वाला नास्तिक था । दूसरा बहुत गरीब था पर पूजा-पाठ, भजन और सत्संग और श्रीग्रंथों का स्वाध्याय करने वाला आस्तिक था । दोनों एक बार जंगल के रास्ते किसी दूसरे गांव कोई मेला देखने जा रहे थे । गरीब दोस्त को रास्ते में ठोकर लगी और पैर में से रक्त बहने लगा । उससे आगे चल रहे अमीर दोस्त को भी ठोकर लगी पर उसे कुछ नहीं हुआ और उसे लगा कि कुछ जमीन में दबा हुआ है जिसके कारण ठोकर लगी है । उसने खोद कर देखा तो एक स्वर्ण कलश में सोने की मोहरे मिली । वह खुशी-खुशी अपने दोस्त गरीब दोस्त का मजाक उड़ाने आया कि ठोकर दोनों को लगी पर  तुम्हें  खून निकल गया और मुझे बेइंतहा धन मिला । तभी आकाशवाणी हुई कि जि से खून आया है उसकी आज मौत लिखी थी पर सत्संग और भजन के प्रभाव से छोटी-सी चोट में प्रभु ने उसे टाल दिया । और जिसे स्वर्ण मुद्राएं मिली है उसके भाग्य में आज एक राजा...

65. तिलक का महत्व

पहले के लोग तिलक, माला, चोटी रखते थे पर आज पश्चिमी संस्कृति का बोलबाला होने पर यह लुप्तप्राय हो गया है । तिलक को मस्तक पर लगाने का कितना बड़ा महत्व है यह एक प्रसंग से समझने में आता है ।   एक व्यक्ति ने एक दुकानदार से तिलक की डिबिया की एक्सपायरी डेट (समाप्ति तिथि) पू छी । वहीं पास में एक संत बैठे थे वे उठकर आए और एक बड़ा मार्मिक उत्तर उस व्यक्ति को दिया । संत बोले कि तिलक की डिबिया की कोई एक्सपायरी डेट नहीं है पर यह प्रभु की प्रसादी जिनके मस्तक पर तिलक के रूप में लगती है उस मस्तक की एक्सपायरी डेट बढ़ा देती है । इसलिए पहले के वैष्णव सदा घर से निकलने से पूर्व प्रभु का प्रसादी तिलक अपने मस्तक पर धारण करके निकलते थे । जैसे एक पतिव्रता स्त्री की पहचान उसके सिंदूर से होती है कि वह शादीशुदा है ऐसे ही प्रभु के आश्रित एक भक्त की पहचान उसके मस्तक पर प्रभु का प्रसादी तिलक लगाने से होती है ।

64. हमने संसार को पकड़ा

उम्र आने पर भी हम संसार में उलझे रहते हैं और मानव जीवन के उद्देश्य भगवत् प्राप्ति की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता । जब कोई हमें आगाह करता है तो हमारा एक ही उत्तर होता है कि क्या करूं संसार के कामों में इतना व्यस्त हूँ कि प्रभु के लिए समय ही नहीं निकल पाता । एक सेठजी एक संत के शिष्य थे । संत उन्हें बार-बार कहते थे कि अब आपके बेटे काम संभाल चुके हैं और आपकी आयु भी अधिक हो गई है तो अब आपको संसार की दुनियादारी छोड़कर भगवत् प्राप्ति के उद्देश्य से प्रभु की भक्ति करनी चाहिए । जितनी बार भी संत ऐसा सेठजी को समझाते सेठजी एक ही बात कहते थे कि चाहता तो मैं भी हूँ पर संसार मुझे छोड़ता ही नहीं । एक बार संत उनके घर पर एक रात रूके । सुबह जब प्रस्थान का समय आया तो संत एक खंभे को प क ड़कर चिपक गए और कहने लगे कि खंभे ने मुझे पकड़ लिया । सेठजी तुरंत बोल पड़े कि गुरुजी आप खंभे को छोड़ दें तो खं भा भी आपको छोड़ देगा । संत बोले कि यही मैं तुमको बताना चाहता हूँ कि तुम संसार में मत उलझो, संसार को छोड़ दो तो संसार भी तत्काल तुम्हें छोड़ देगा । संत ने आगे कहा कि संसार ने तुमको नहीं पकड़ा   है अपितु जैस...

63. उल्टी रेखाएं

चाहे कोई धनवान हो या गरीब सबको सातों सुख नहीं मिलते । सबके मस्तक पर उल्टी लकीर यानी रेखाएं होती ही हैं । किसी को पुत्र का सुख नहीं, किसी को धन की कमी है, किसी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, किसी को अन्य कोई अशांति रहती है । एक संत एक कथा सुनाते थे । वे कहते थे कि रबर स्टांप   में शब्द और अंक उल्टे होते हैं पर जब वह स्याही में लगाकर कागज पर लगाए जाते हैं तो कागज पर सुलटे हो जाते हैं । वैसे ही जब हमारा मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकता है और वहाँ की श्रीरज हमारे मस्तक पर लगकर फिर संसार पटल पर हमारा मस्तक लगता है तो ही वह सुलटा पड़ता है । नहीं तो उल्टी रेखाएं यानी धनहीनता, बीमारी, शोक, रोग, बिगड़े रिश्ते, बच्चों द्वारा परेशानी, व्यापार-नौकरी की दिक्कतें, अन्य अशांति इत्यादि हमें जीवन भर परेशान करके रखती हैं । पर जब साष्टांग दंडवत प्रणाम में हमारा मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकता है तो हमारी उल्टी रेखाएं सुलटी हो जाती हैं । प्रभु को किया एक प्रणाम जीवन के कितने बड़े परिणाम को बदलने की क्षमता रखता है ।

62. प्रभु के श्रीकमलचरण

हम संसार में शांति और आनंद खोजते हैं पर हमें नहीं मिलती क्योंकि जो चीज जहाँ पर नहीं होगी वह वहाँ से कैसे मिलेगी ? जो सामान एक कमरे में नहीं है उसे कितना भी आप खोजिए वह वहाँ पर कभी नहीं मिलेगा । एक संत एक कथा सुनाते थे । जब प्रभु ने सृष्टि ब ना ई तो प्रभु श्री नारायणजी के आदेश से उनके श्रीकमलचरणों से निकलकर ऐश्वर्य, श्री, कीर्ति इत्यादि सभी पृथ्वीलोक में चले गए । भगवती लक्ष्मी माता प्रभु के श्रीकमलचरणों की सेवा कर रही थीं । उन्होंने ध्यान लगाकर देखा कि कुछ तो प्रभु के श्रीकमलचरणों में चिपका रह गया जो पृथ्वीलोक में नहीं गया । ध्यान लगाकर देखने पर ज्ञात हुआ कि शांति और आनंद पृथ्वीलोक में नहीं गए और प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही चिपके रह गए । हम शांति और आनंद संसार में खोजते हैं पर वह तो हमारा मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकने पर ही हमें मिल सक ते  हैं । इसलिए हमें गलत जगह पर यानी संसार में शांति और आनंद को खोजने का प्रयास नहीं करना चाहिए । हमें अपना मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकना चाहिए तो ही हमें प्रसाद रूप में प्रभु से शांति और आनंद की प्राप्ति हो पाएगी ।

61. शरणागति का महत्व

प्रभु की शरणागति का बहुत बड़ा महत्व है । प्रभु की शरण में आने पर कोई विपत्ति हमें परेशान नहीं कर सकती । प्रभु उन सबको शरण देते हैं जो उनकी शरणागति स्वीकार करना चाहते हैं । प्रभु की श्रीमद् भगवद् गीताजी के अठारहवें अध्याय में घोषणा है कि प्रभु की शरण में आने पर प्रभु हमें सभी पापों से मुक्त कर देंगे । दूसरा आश्वासन प्रभु का है कि “चिंता मत करो” क्योंकि प्रभु हमारे संरक्षण के लिए तैयार खड़े हैं । ये दोनों कित ने ब ड़े आश्वासन हैं कि सभी जन्मों-जन्मों के संचित पापों से मुक्त कर देना और सभी चिं ताओं का हरण कर लेना । संत कहते हैं कि दुराचारी-से-दुराचारी भी अगर प्रभु की शरण में आता है और सच्चा पश्चाताप करता है और अपने द्वारा की गई गलती या पाप को जीवन में नहीं दोहराने का संकल्प करता है तो प्रभु तत्काल उसे चिंताओं से निश्चिंत कर पाप मुक्त कर देते हैं और उसका उद्धार कर देते हैं । यह प्रभु की कितनी विलक्षण करुणा, कृपा और दया है ।

60. योगक्षेम का महत्व

प्रभु द्वारा श्रीमद् भगवद् गीताजी में भक्तों का योगक्षेम वहन करने का प्रण लिया हुआ है । यह एक अदभुत प्रण है जिसके अलावा हमें प्रभु से कुछ अन्य चाहने की जरूरत ही नहीं होती । प्रभु के इस एक प्रण में सब कुछ समाहित है । योगक्षेम संस्कृत का शब्द है और दो शब्दों से बना है । पहला शब्द है “योग” जिसका अर्थ है कि अप्राप्त की प्राप्ति करना । यानी प्रभु वचन देते हैं कि जो भक्त उ न की शरण में है उसे जब भी, जिस भी चीज की आवश्यकता पड़ेगी प्रभु उसे उपलब्ध कराएंगे । आज से दस वर्ष बाद भी जिस चीज की आवश्यकता है वह हमें आज परिश्रम के बाद भी शायद नहीं मिले पर निर्धारित समय पर प्रभु अवश्य उसे प्रदान करेंगे । दूसरा शब्द “क्षेम” है जिसका अर्थ है कि जो हमें प्राप्त है प्रभु कृपा करके उसकी रक्षा और संरक्षण करेंगे । यह कितना बड़ा आश्वासन है नहीं तो प्रारब्ध राजा को रं क बना देता है । प्रभु के इन दो आश्वासनों के अलावा देखा जाए तो एक भक्त को और कुछ भी नहीं चाहिए । सभी बातें पूर्ण रूप से इन दो आश्वासनों में आ गई । जो अप्राप्त है उसे प्रभु प्राप्त करा देंगे और जो प्राप्त है उसकी प्रभु रक्षा करेंगे । जरूरत है तो ...

59. भक्ति की व्याख्या

भक्ति शब्द का प्रयोग सनातन धर्म के हर शास्त्र और श्रीग्रंथ में बड़ी श्रद्धा के साथ किया गया है । पर भक्ति किसे कहते हैं, सबसे सरल भाषा में हम भक्ति को समझने का प्रयास करते हैं । वैसे तो भक्ति की बहुत बड़ी व्याख्याएं हैं । पर जो सबसे समझने योग्य और सरल है वह यह है कि सबसे सरलतम भाषा में समझे तो प्रभु से पूर्ण रूप से प्रेम करना ही भक्ति है । हम सभी प्रेम करना जानते हैं । कोई सांसारिक रिश्तों से प्रेम करता है, कोई धन से प्रेम करता है, कोई अन्य सांसारिक पदार्थों से प्रेम करता है । हमें बस उस प्रेम की दिशा को मोड़कर और बदलकर प्रभु की तरफ कर देना है यानी प्रभु से प्रेम करना ही भक्ति है । देखिए कितना सरल है भक्ति करना । प्रभु हमसे सिर्फ प्रेम चाहते हैं । प्रभु से पूर्ण प्रेम करने लग जाए तो प्रभु तत्काल संतुष्ट हो जाते हैं और हमारी भक्ति सिद्ध हो जाती है । पर दुर्भाग्यवश इतना सरल होने पर भी हम ऐसा नहीं कर पाते । हमें केवल और केवल प्रेम की दिशा को बदलना है, अन्य कुछ भी नहीं करना क्योंकि प्रेम करना सभी जी वों को आता है । बस वह प्रेम प्रभु से हो जाए तो हम भक्ति में सफल हो जाते हैं ।

58. सुख और दुःख

सुख और दुःख सबके जीवन में आते हैं । सभी को जीवन में किसी-न-किसी समय सुख या दुःख का सामना करना पड़ता है । संतों और भक्तों ने सुख से ज्यादा दुःख की महिमा बताई है । एक संत एक कथा सुनाते थे । एक बार अचानक एक मोड़ पर सुख और दुःख की मुलाकात हो गई । दुःख ने सुख से कहा कि तुम कितने भाग्यशाली हो कि संसार के लोग तुम्हें प्राप्त करने की कोशिश में जीवन भर लगे रहते हैं । सुख असली बात जानता था और उसने बड़े विनम्र होकर दुःख को बड़ा मार्मिक उत्तर दिया । सुख ने मुस्कुराते हुए दुःख से कहा कि भाग्यशाली मैं नहीं तुम हो । दुःख ने हैरानी से पूछा कैसे ? तो सुख ने ब ड़ी ईमानदारी से सच्चा जवाब दिया । सुख ने कहा कि मुझे पाकर सभी लोग प्रभु को भूल जाते हैं और मेरा उपभोग करने में ही जीवन और यहाँ तक कि बुढ़ापा भी बिता देते हैं । पर इसके ठीक विपरीत तुम्हें पाकर लोग तुरंत प्रभु को याद करते हैं और प्रभु की शरण में चले जाते हैं । तो जो प्रभु को बिसरा दे वह बड़ा या जो प्रभु से मिला दे वह बड़ा । इसलिए ही संतों और भक्तों ने जीवन में दुःख का सहर्ष स्वीकार किया और प्रभु प्राप्ति में सहयोग के लिए दुःख को धन्यवाद दिया है ।

57. प्रभु का साम्राज्य

प्रभु एक नहीं बल्कि कोटि-कोटि ब्रह्मांडों के मालिक और निर्माता हैं । हम थोड़ी-सी जमीन-जायदाद रूपी संपत्ति पाकर गर्व करने लगते हैं और उसका अहंकार कर लेते हैं जो बिलकुल गलत है । एक संत एक कथा सुनाते थे । एक राजा था जिसका राज्य काफी बड़ा और फैला हुआ था । उसे घमंड था कि वह एक बहुत बड़ा राजा है । एक महात्मा उसके राज्य की सीमा पर आए और अपने शिष्यों के साथ कुछ समय ठहरे । वे एक सिद्ध महात्मा थे जिनकी ख्याति फैली हुई थी । राजा उनसे मिलने भेंट सामग्री लेकर गया । मिलने पर राजा के अहंकार को भांपते महात्मा को देर न लगी क्योंकि राजा ने अपना परिचय यह कह कर दिया कि इस विशाल साम्राज्य का मैं राजा हूँ । महात्मा ने राजा से कहा कि विश्व का नक्शा मंगवाओ और उसमें मुझे तुम्हारा राज्य दिखाओ । राजा ने नक्शा मंगवाया और उसका बड़ा राज्य उसमें एक बिंदु सामान था । तब महात्मा ने कहा कि मेरे जो राजा हैं यानी प्रभु उनका साम्राज्य इस नक्शे जैसे कोटि-कोटि न क्शों में भी नहीं समा सकता । राजा को अपनी गलती महसूस हुई, उसका अहंकार चूर हुआ और वह लज्जित हुआ ।

56. प्रभु के लिए एक नियम

आजकल लोग सेहत को लेकर बहुत जागरूक हैं और प्रायः सुबह पार्क में टहलने जाते हैं । कोई दो किलोमीटर कोई तीन किलोमीटर तक सुबह पैदल चलता है । एक संत एक बहुत सुंदर संशोधन इस क्रम में बताते हैं । वे कहते हैं कि अगर घूमने का उद्देश्य मंदिर कर दिया जाए तो यह पूरा-का-पूरा कर्म भक्ति बन जाता है । अगर हमें तीन किलोमीटर सुबह चलना है तो एक ऐसे मंदिर का चयन करें जो आपके घर से डेढ़ किलोमीटर पर हो । मंदिर चलकर पहुँचे, प्रभु का दर्शन किया और चलकर वापस घर आ गए । इस तरह आपका चलना डेढ़ और डेढ़ मिलाकर तीन किलोमीटर हो गया और सुबह की मंगल बेला में प्रभु के दर्शन भी हो गए जिससे आपका पूरा दिन मंगलमय हो जाएगा । प्रभु इतने दयावान और कृपानिधि हैं कि आपको पांच मिनट के दर्शन का पुण्य नहीं बल्कि आपके घर से चलकर वापस घर आने में जितना समय लगा उतना पुण्य आपके खाते में लिख देते हैं । ऐसा इसलिए क्योंकि दयावान प्रभु यह मान लेते हैं कि आपने पैदल चलकर मंदिर आना और वापस जाना अपने प्रभु के लिए किया जबकि हमारा पैदल चलने का एक उद्देश्य स्वास्थ्य भी था । पर प्रभु उसे अनदेखा कर आने-जाने के पूरे समय का पुण्य आपके खाते में लिख द...