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28. आस्था हो तो प्रभु स्वयं पधारते हैं

अगर हमारे मन में प्रभु के लिए आस्था है तो प्रभु स्वयं उस आस्था को पूर्ण करने के लिए कोई भी कसर नहीं छोड़ते । हमारी आस्था को प्रभु पूर्ण रूप से निभाते हैं और उस आस्था को मजबूत करते हैं । एक बार की घटना है । एक राहगीर का रास्ते में एक्सीडेंट हो गया । उसे काफी चोट लगी और उसने आसपास के लोगों को पुकारा पर पुलिस के डर से कोई भी नहीं आया । अंत में लहूलुहान अवस्था में उसने प्रभु को पुकारा और प्रभु स्वयं मनमोहन नाम बनाकर आ गए । प्रभु ने उसे अस्पताल पहुँचाया, खर्चे के लिए रुप ये दिए, डॉक्टर और दवाई के लिए व्‍यवस्‍था की और दो-तीन दिन सेवा करने के बाद जब वह ठीक हो गया तो प्रभु अंतर्ध्यान हो गए । इस बीच उसके बार-बार पूछने पर प्रभु ने अपना पता जरूर उसे बताया था कि मैं कहाँ रहता हूँ । तो ठीक होने के बाद जब वह व्यक्ति उस पते पर मनमोहन को खोजता हुआ गया तो एक मंदिर मिला जो कि प्रभु श्री मनमोहनजी का ही मंदिर था । अब उस व्यक्ति को समझते देर नहीं लगी कि यह तो साक्षात प्रभु ही थे जो मदद करने के लिए मनमोहन नाम बनाकर आए थे ।

27. प्रभु की गोद

विकट-से-विकट परिस्थिति में भी प्रभु पर हमारा विश्वास पूर्ण और अटल होना चाहिए । प्रभु यही देखते हैं कि विपत्ति की बेला पर जीव उन पर कितना अटूट विश्वास कायम रख पाता है । जो ऐसा कर पाते हैं उन्हें प्रभु की कृपा मिलती है और उनका बाल भी बाँका नहीं होता । श्री रामायणजी का प्रसंग है कि जब मेघनाथ की शक्ति श्री लक्ष्मणजी को लगी और प्रभु श्री हनुमानजी संजीवनी लाने गए । संजीवनी लेकर लौटते वक्त बीच में श्री अयोध्याजी पड़ी और प्रभु श्री हनुमानजी कुछ समय के लिए किसी कारण वश वहाँ रुके । उन्होंने युद्ध का समाचार सुनाया और यह बताया कि श्री लक्ष्मणजी को शक्ति लगी है और वै द्य जी ने कहा है कि सूर्योदय तक संजीवनी नहीं आने पर उनके प्रा णों पर संकट है ।  यह बात श्री लक्ष्मणजी की पत्नी भगवती उर्मिलाजी ने सुनी और एक प्रश्न किया कि अभी श्री लक्ष्मणजी किस दशा में हैं । प्रभु श्री हनुमानजी बोले कि प्रभु श्री रामजी ने अपनी गोद में उनका मस्तक रखा हुआ है और श्री लक्ष्मणजी प्रभु श्री रामजी के सामने लेटे हुए हैं । इतना सुनना था कि भगवती उर्मिलाजी हर्षित हो उठी । प्रभु श्री हनुमानजी को भी आश्चर्य हुआ ...

26. नास्तिक से आस्तिक

बहुत सारे लोग बचपन में नास्तिक होते हैं पर उन पर प्रभु कृपा करते हैं और उनके जीवन में वे प्रभु का कुछ ऐसा चमत्कार देखते हैं जिससे प्रभु के लिए आस्था कायम हो जाती है । आज ऐसी ही एक कथा आपको सुनाते हैं । एक शहर में एक अंग्रेजी दवाई की दुकान थी जिसका मालिक प्रभु का भक्त था । वह रोज सुबह और शाम दुकान में प्रभु की फोटो के आगे अगरबत्ती लगाता , हाथ जोड़ता और पाठ करता । यह देखकर उसका इकलौता बेटा मुस्कुराता क्योंकि वह नास्तिक था । पिता बूढ़ा हो गया था और जब अंत समय आया तो उसने अपने बेटे को बुलाया और कहा कि दुकान पर प्रभु की फोटो को देखकर हाथ जोड़ ने और अगरबत्ती लगाने का नियम मुझे वचन के रूप में दो । अपने पिता की अंतिम इच्छा मानते हुए बेटे ने वचन स्वीकार कर लिया । पिता का देहांत हो गया और बेटा दुकान संभालने लगा । वह बिना मन के पिता को दि ए वचन को निभाने के लिए प्रभु की फोटो पर रोज दो समय हाथ जोड़ता और अगरबत्ती लगा ता ।  एक बार शाम 7 बजे बिजली चली गई और दुकान में अंधेरा छा गया । तभी एक आदमी आया और डॉक्टर की पर्ची दिखाकर कहा कि मेरी बूढ़ी माँ बहुत बीमार है और डॉक्टर ने कहा है कि घं...

25. प्रभु की जय

पुराने लोगों में प्रभु की जय बोलने की आदत होती थी । वे सोते-उठते, चलते-फिरते, खाते-पीते प्रभु की जय बोलते थे । यह सिद्धांत है कि प्रभु की निरंतर जय बोलने वाले के जीवन में निरंतर जय होती है । उसका मंगल-ही-मंगल होता है और कभी अमंगल नहीं होता । यह एक बहुत अच्छी आदत है जिसे जीवन में हमें भी अपनानी चाहिए । एक राजा का बड़ा बगीचा था जिसमें बहुत तरह के फल-फूल लगे थे । बहुत सारे माली काम करते थे । उसके प्रधान माली की आदत थी कि हर समय प्रभु की जय बोलता रहता था । प्रत्येक रविवार प्रधान माली टोकरी में फल लेकर राजमहल जाता और चूंकि राजा फलों का शौकीन था सो वह फल खाता था । एक रविवार माली ने सोचा कि आज कौन-सा फल लेकर जाऊं ? उसने नजर दौड़ाई और नारियल ले जाने का मन हुआ तभी उसके मुँह से निकल गया कि प्रभु की जय हो । उसका मन बदल गया और वह नारियल की जगह अंगूर की टोकरी लेकर राजमहल गया । राजा विनोदी स्वभाव का था , उस ने अपने प्रिय माली को पास बैठा लिया । वह एक अंगूर खाता और एक अंगूर विनोद में माली के माथे पर मारता । माली के माथे पर जैसे ही अंगूर लगता वह कहता प्रभु की जय हो । राजा से रहा नहीं गया और...

24. प्रभु पर विश्वास

हमें हर परिस्थिति में खासकर विपत्ति की बेला में प्रभु पर विश्वास दृढ़ रखना चाहिए । इससे उस विपत्ति से प्रभु हमें निकाल लाते हैं और उस परिस्थिति पर हमारी विजय होती है । प्रभु पर विश्वास इसलिए दृढ़ होना चाहिए क्योंकि हर विपरीत परिस्थिति भी प्रभु के एक इशारे पर अनुकूल हो जाती है । एक संत अपने एक शिष्य के साथ समुद्र में जहाज में यात्रा कर रहे थे । जहाज में काफी लोग थे । अचानक जोरदार तूफान आया और जहाज पानी में डगमगाने लगा । सभी यात्री बुरी तरह से डर गए और प्रभु को पुकारने लगे । संत अपने स्थान पर शांत बैठे रहे जैसे कुछ हुआ ही नहीं । उनका शिष्य दौड़ता हुआ आया और पूछा कि आपको डर नहीं लग रहा कि जहाज तूफान के कारण डूब जाएगा । संत ने एक चाकू, जिसे वे फल सुधारने के लिए अपनी झोली में रखते थे, उसे निकाला और शिष्य के गले पर लगा दिया । संत ने अपने प्रिय शिष्य से पूछा कि क्या चाकू से तुम्हें डर नहीं लग रहा ? शिष्य बोला कि क्योंकि चाकू आपके हाथ में है और आप मेरा बुरा नहीं करेंगे इसका मुझे पक्का विश्वास है इसलिए चाकू गले में लगने पर भी मुझे डर नहीं लग रहा । संत ने चाकू गले से हटाया और कहा कि इसी तरह यह...

23. हर कर्म में प्रभु का अनुग्रह देखें

हर कर्म में प्रभु का अनुग्रह देखना चाहिए । जब हम प्रभु पर विश्वास करते हैं तो सदैव प्रभु की कृपा हमारा मंगल ही करती है । प्रभु को शास्त्रों में मंगल के भवन और अमंगल को हरने वाला कहा गया है और प्रभु ऐसा ही करते हैं । हमें प्रभु पर विश्वास होना चाहिए कि प्रभु हमारा मंगल करेंगे तो हमारा मंगल होता चला जाएगा । जिस क्रिया में शुरुआत में हमें अपना मंगल दिखाई नहीं देगा वह भी अंत में हमारा मंगल करके ही जाएगा । एक राजा के यहाँ एक मंत्री था जो बड़ा प्रभु भक्त था और जो भी होता उसके मुँह से भक्ति का कारण एक ही बात निकलती कि प्रभु ने भली करी । एक बार राजा तलवारबाजी कर रहा था कि उसका अंगूठा कट गया । मंत्री के मुँह से निकल गया प्रभु ने भली करी । राजा गुस्से में आ गया और मंत्री को कारागार में डालने का आदेश दे दिया । जब राजा के सैनिकों ने पकड़ा तो मंत्री ने फिर यही कहा कि प्रभु ने भली करी । हफ्ते भर बात राजा स्वस्थ हुआ तो शिकार खेलने निकला । जंगल में शिकार की तलाश में बहुत आगे तक चला गया और अपने सैनिकों को पीछे छोड़ दिया । वह राह भटक गया और संध्या होने लगी । तभी कुछ डाकुओं ने उसे पकड़ लिया क्योंकि डा...

22. प्रभु पर विश्वास

प्रभु पर पूर्ण विश्वास होना मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है । प्रभु केवल यह देखते हैं कि यह जीव संसार पर , धन पर , शक्ति पर और साधन पर विश्वास करता है या केवल मेरे पर विश्वास करता है । जो केवल प्रभु पर विश्वास करते हैं प्रभु उनका पूरा दायित्व उठाते हैं , उन्हें संकट से बचाते हैं और उनका मंगल करते हैं । हम टैक्सी में बैठते हैं तो ड्राइवर का बिना लाइसेंस देखे ही उसपर विश्वास कर उसके साथ यात्रा कर लेते हैं । हवाई जहाज में पायलट का बिना लाइसेंस देखे ही विश्वास कर हवाई यात्रा कर लेते हैं पर जब प्रभु पर विश्वास करने का समय आता है तो हम चूक जाते हैं । एक कस्बे में 3 वर्षों तक अकाल पड़ा । गांव वाले बहुत परेशान थे । खेती सूख गई , पीने के पानी की किल्लत हो गई । ब्राह्मणों से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि 18 दिवसीय यज्ञ कराया जाए । यज्ञ प्रारंभ हुआ । सब गांव वाले रोजाना यज्ञ में शामिल होने आते । पूर्णाहुति यानी यज्ञ के अंतिम दिन गांव का एक छोटा बालक भी यज्ञ के दर्शन करने आया पर हाथ में छाता लेकर आया । तब तक वर्षा के कोई आसार नहीं थे और धूप निकली हुई थी । गांव वालों ने बालक से मजाक में पूछा ...

21. प्रभु युक्ति से भक्तों को बचाते हैं

भक्त कितना भी बिगाड़ कर ले पर अगर अनन्यता से प्रभु पर भरोसा करता है तो प्रभु अंतिम अवस्था में भी युक्ति निकाल अपने भक्तों को बचाते हैं और उसका बाल भी बाँका नहीं होने देते । प्रसंग श्री महाभारतजी के युद्ध का है । प्रभु श्री कृष्णजी के संरक्षण में पांडवों ने कौरव सेना और कौरव महारथियों का सफाया कर दिया । केवल दुर्योधन घायल अवस्था में बचा था और वह जाकर एक तालाब में छिप गया । प्रभु यह जानते थे और वे पांचों पांडवों को लेकर तालाब पर गए । पांडवों ने दुर्योधन को युद्ध के लिए ललकारा । दुर्योधन तालाब से बाहर आया तो श्री युधिष्ठिरजी ने उससे कहा कि हम पांचों में से किसी एक को गदा युद्ध करने के लिए चुन लो । प्रभु तुरंत भाप गए कि श्री युधिष्ठिरजी ने आवेश में गलत कह दिया । दुर्योधन प्रभु श्री बलरामजी से गदा युद्ध सीखा हुआ है और बहुत बलवान है और श्री युधिष्ठिरजी , श्री अर्जुनजी , श्री नकुलजी और श्री सहदेवजी को आसानी से गदा युद्ध में परास्त करके मार सकता है । पांडवों का एक प्रण था कि एक पांडव भी अगर मारा जाता है तो युद्ध बंद कर बाकी बचे हुए चारों पांडव अग्नि प्रवेश करेंगे । प्रभु ने देखा कि अगर दुर...

20. हर जगह प्रभु को साथ रखें

एक आदत बना लें कि जब भी घर से निकलें तो मन में कहें कि प्रभु साथ चलें और मार्गदर्शन करें ताकि मैं कोई गलती न कर बैठूं । घर में रहें तो प्रभु की  मनोमय (मन में बनाई गई प्रभु की प्रतिमा)  प्रतिमा अपने कार्यस्थल में लगा कर रखें और बीच-बीच में कार्य करते-करते प्रभु को देखें और बात करें कि मैं सही कार्य कर रहा हूँ की नहीं । पांडवों ने प्रभु श्री कृष्णजी को सदैव अपने साथ रखा और प्रभु ने पग-पग पर उनकी रक्षा की ।   सौ कौरव मारे गए पर पांचो पांडव प्रभु कृपा से बच गए । भगवती कुंतीजी , जो पांडवों की माता थी , उन्होंने प्रभु का एहसान मानते हुए सारे प्रसंग गिनाए जब प्रभु ने साक्षात रूप से पांडवों के प्राणों की रक्षा की । इतना बड़ा युद्ध , अपने से विशाल सेना और अनेक महारथियों के होने के बाद भी प्रभु के कारण पांडवों को विजयश्री मिली , वो भी प्रभु के बिना शस्त्र उठाए । पर पांडव एक जगह प्रभु को बिना लिए और प्रभु को बिना पूछे गए और फंस गए । यह प्रसंग था जुए के न्‍योते का जो उनके ताऊजी धृतराष्ट्र ने भिजवाया था । अगर वे प्रभु से पूछते तो प्रभु मना कर देते कि नहीं जाना है । अगर पांडव दुह...

19. भक्ति की अदभुत मिसाल

वैसे तो भक्ति जगत में कई बड़े - बड़े भक्त हर युग में हुए हैं पर चारों युगों में प्रभु श्री हनुमानजी जैसा कोई भक्‍त न कभी हुआ है और न आगे होगा । प्रभु श्री हनुमानजी की श्रीराम भक्ति इतनी श्रेष्ठ है कि प्रभु श्री रामजी ने अपने श्रीमुख से वह अमर वचन कहा कि वे कुछ भी करके , कैसे भी प्रभु श्री हनुमानजी के ऋण से उऋण नहीं हो सकते । प्रभु श्री हनुमानजी की भक्ति की एक बड़ी मार्मिक कथा आपको सुनाते हैं । लंका युद्ध हो चुका था और प्रभु का श्री अयोध्याजी में आगमन और राजतिलक भी हो चुका था । राजतिलक वाली रात चारों भाई और बहुएं और प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु के कक्ष में उपस्थित थे । रात्रि ज्यादा होती देख श्री शत्रुघ्नजी ने सबसे कहा कि भैया और भाभी को विश्राम की जरूरत है , इसलिए सबको चलना चाहिए और उन्हें एकांत देना चाहिए । सब प्रभु और माता को प्रणाम करके चलने लगे पर प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही बैठे रहे । तब श्री शत्रुघ्नजी ने उनसे कहा कि आपको भी चलना चाहिए और प्रभु को एकांत देना चाहिए । प्रभु श्री हनुमानजी ने भगवती सीता माता की तरफ इशारा करके कहा कि माता भी तो बैठी हैं । तो श्र...

18. अनन्यता प्रभु को सबसे प्रिय

शास्त्रों में एक बात हर जगह प्रतिपादित है कि प्रभु के लिए अनन्यता होनी चाहिए । अनन्यता का सीधा अर्थ है कि अन्य नहीं , केवल प्रभु । अन्य को हम साथ में रखते हैं तो प्रभु हस्तक्षेप नहीं करते । भगवती द्रौपदीजी की लाज प्रभु ने बचाई । भगवती द्रौपदीजी ने प्रभु से बाद में एक बार प्रश्न किया कि जब लाज बचानी थी तो पहले क्यों नहीं आए , अंतिम अवस्था में ही क्यों आए ? प्रभु ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया । प्रभु बोले कि पहले तुमने मुझे पुकारा और साथ में अपने पतियों को भी पुकारा । पति कुछ न कर पाए तो मेरे साथ में श्री भीष्‍म पितामह , गुरु श्री द्रोणाचार्य और श्री कृपाचार्य और ससुर धृतराष्ट्र को भी पुकारा । फिर मेरे साथ अपने बल पर भरोसा किया , दोनों हाथों से साड़ी पकड़ कर रखी और मुँह से साड़ी दबा कर रखी । फिर एक हाथ से साड़ी छोड़ी , कुछ समय के बाद दूसरे हाथ से साड़ी छोड़ी । पर जब अंतिम जगह मुँह से पकड़ी साड़ी भी छोड़ी और मुझे अनन्य होकर पुकारा तो मैं तुरंत आ गया और वस्त्र अवतार लेकर अपने भक्‍त से लिपट गया । प्रभु ने कहा कि जब तुमने सबसे पहले पुकारा था तो मैं श्रीद्वारकापुरी में खाना खाने बैठा था ...

17. मृत्यु के बाद केवल भक्ति काम आएगी

मृत्यु के बाद हमारा परिवार , जमीन जायदाद , पू रा जीवन लगाकर कमाए  धन में से कुछ भी हमारे काम आने वाला नहीं है । यह सब कुछ य हीं संसार में रह जाने वाला है और हमें निराश मन से सब कुछ छोड़कर आगे की यात्रा में जाना पड़ेगा । मृत्यु के बाद जो हमारे साथ जाए गा वह हमारी उस जीवन में की हुई प्रभु की भक्ति ही है । प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहा है कि कोई जीव अपनी भक्ति की पूंजी को कभी खोता नहीं है और मृत्यु के बाद भी वह भक्ति की पूंजी उसके साथ रहती है और उसके काम आती है । एक संत कुटिया में रहते थे और प्रभु की भक्ति करते थे । उन के भजनानंदी होने की ख्याति सब तरफ फैली हुई थी । पास का एक राज्य बड़ा संपन्न था और राजा के पास खूब संपत्ति थी । उस राजा को अभिमान भी था कि इत ने युद्ध विजय करके अपने राज्य की संपत्ति और सीमा को उसने बहुत बढ़ाया है । एक बार पूरे लवाज मे के साथ भेंट सामग्री में बेशकीमती रत्‍न लेकर वह उन संत से मिलने गया । संत उस समय अपनी फटी धोती को रफू कर रहे थे । राजा हाथी पर बैठकर आया और उसे देखते ही संत भाप गए कि इसका अभिमान ही इसे यहाँ लाया है । राजा ने संत को प्रणाम क...

16. प्रभु को किए प्रणाम का महत्व

प्रभु को किए प्रणाम का कितना बड़ा महत्व है यह हमें समझना चाहिए । प्रभु को प्रणाम करने से प्रभु का मंगल आशीर्वाद हमें मिलता है जिससे हमारा कल्याण - ही - कल्याण होता है । नित्य मन से किया प्रणाम प्रभु को हमारे वश में कर देता है । प्रणाम करने से प्रभु का रक्षा कवच हमें प्राप्त हो जाता है । श्री महाभारतजी का एक जीवंत उदाहरण है ।   सांसारिक व्यक्ति को किया प्रणाम भी कितना फलता है तो परमपिता प्रभु को किया प्रणाम तो हमारा परम मंगल करता ही है । श्री महाभारतजी के युद्ध में कौरव और पांडवों की सेना आमने-सामने थी और कुछ ही समय बाद युद्ध प्रारंभ होने वाला था । एकाएक स ब ने देखा कि श्री युधिष्ठिरजी अपने शस्त्र रखकर रथ से उतरे और पैदल कौरव पक्ष में गए । उन्होंने श्री भिष्‍म पितामह और गुरु श्री द्रोणाचार्यजी को झुककर प्रणाम किया और आशीर्वाद मांगा । दोनों को आशीर्वाद रूप में कहना पड़ा कि विजयी हो । अब जरा सोचें अगर अपनी दुर्बुद्धि , अहंकार और अकड़ छोड़कर दुर्योधन भी यह देखकर पांडव पक्ष में चला आता और प्रभु श्री कृष्णजी को प्रणाम करता तो प्रभु को भी आशीर्वाद देना पड़ता और प्रभु भी कहते विज यी भ...

15. भक्ति की तैयारी

हमारे मन को बचपन से ही प्रभु भक्ति के लिए तैयार करना चाहिए । भक्ति प्रभु को पाने का और मानव जीवन को सफल बनाने का सबसे सटीक और सबसे सरल साधन है । जब हम बचपन में श्री प्रह्लादजी , श्री ध्रुवजी के श्री चरित्र से अपने मन को प्रभावित करते हैं तो मन भी उनका अनुसरण करने को तैयार होने लगता है । पर हमारा दुर्भाग्य है कि हम बचपन में श्री प्रह्लादजी , श्री ध्रुवजी को अपना आदर्श नहीं बना कर बचपन में क्रिकेटर और फिल्म स्टार को अपना आदर्श बनाते हैं । जैसे रास्ते पर चलने वाला कुत्ता फालतू होता है और घर में पला हुआ कुत्ता पालतू होता है । फालतू कुत्ते को कोई भी मार सकता है पर पालतू कुत्ते को मारते ही उसका मालिक उसे बचाने आ जाता है । वैसे ही अगर हम प्रभु से नहीं जुड़े तो हम फालतू हैं और भक्ति से प्रभु से जुड़े हैं तो हम प्रभु के पालतू हैं । फिर कोई भी हमें कष्ट देता है तो प्रभु की शक्ति हमारे बचाव में तत्काल आ जाती है । जैसे पालतू कुत्ते को समझदारी से सिखाया जाता है कि दरवाजे पर आवाज आते ही उसे भौं क कर सबको सतर्क करना है और भी आजकल ट्रेनर बहुत सारे काम एक पालतू कुत्ते को सिखाते हैं और वह पालतू कुत...

14. श्रीराम नाम की महिमा

सनातन धर्म में प्रभु के अगणित रूप और अगणित नाम हैं । यह सनातन धर्म का अद्वितीय गौरव है कि प्रभु कितने नाम और रूपों से इस धर्म में प्रकट हुए हैं । श्री रामचरितमानसजी में देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने प्रभु श्री रामजी से एक वरदान मांगा । उन्होंने मांगा कि प्रभु के सभी नामों में श्रीराम नाम का माहात्म्य सबसे विलक्षण हो । प्रभु ने ऐसा ही वरदान दिया और भारतवर्ष में प्राचीन काल से प्रभु श्री रामजी का नाम हर व्यवहार में प्रयोग में आने लग गया । कोई भी व्यक्ति दुःख में “ हे राम ” का उच्चारण करता मिलेगा । कोई पीड़ा में हो तो “ अरे राम बचाओ ” का उच्चारण करता मिलेगा । कोई लज्जा का कार्य करेगा तो कहने वाले कहेंगे कि “ हाय राम ” शर्म नहीं आई ऐसा करते हुए । कोई अशुभ घटना को देखकर हम “ अरे राम-राम ” ऐसा हो गया यह कहते हैं । किसी का अभिवादन करना है तो हम “ राम-राम ” कहते हैं । दो बार राम कहने का सीधा अर्थ है कि एक राम जो मेरे अंदर हैं और एक राम जो आपके अंदर हैं उन दोनों को प्रणाम करना और उन दोनों का अभिवादन करना । किसी को शपथ खानी हो तो आज भी “ राम दुहाई ” यानी प्रभु श्री रामजी के नाम की शपथ दिल...

13. प्रभु भक्त की महिमा

प्रभु की भक्ति हमारा कितना उत्थान करवाती है और प्रभु का जन बन जाने से जगत में कितना मान मिलता है इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । प्रभु स्वयं अपने भक्‍त का मान बढ़ाने के लिए कई चमत्कार करते हैं जिससे उनके प्रिय भक्‍त की कीर्ति चारों दिशाओं में फैल जाए । इससे प्रभु को जो सुख मिलता है उतना सुख प्रभु को अन्‍य किसी चीज से नहीं मिलता । एक राज्य में राजा के यहाँ एक मंत्री कार्य करता था जो कि भक्त था । वह रोज राज्यसभा में नीचे अपने स्थान पर खड़ा होकर ऊपर राजसिंहासन पर बैठे राजा के सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता था । एक दिन उसे यह भाव आया कि हाथ जोड़ना ही है तो प्रभु के जोड़ने चाहिए और उसने राजा को अपना इस्तीफा दे दिया । भक्त तो वह पहले से था ही अब वह जंगल में जाकर कुटिया में रहकर प्रभु की भक्ति करने लगा । प्रभु दिखाना चाहते थे कि उनसे जुड़ने पर क्या होता है । वह मंत्री एक संत के रूप में बहुत सिद्धियां प्राप्त कर ख्याति को प्राप्त हुआ । एक बार उस राजा के राज्य में अकाल पड़ा । दो-तीन वर्षों तक वर्षा ही नहीं हुई । किसी ने कहा कि किसी बड़े संत से अनुष्ठान कराना चाहिए । उस समय मंत्री के रूप में जो प...

12. प्रभु का दिशा निर्देश

जो भक्त प्रभु की भक्ति करता है उसे समय-समय पर प्रभु का दिशानिर्देश और प्रभु की सहायता प्राप्त होती रहती है । किसी भी कार्य के सफल संपादन में नाम उस भक्त का होता है पर करने वाले प्रभु ही होते हैं । प्रभु कभी श्रेय लेना नहीं चाहते । अपने भक्त को श्रेय दिलाकर और जगत में उसका मान बढ़ाकर प्रभु को सबसे ज्यादा प्रसन्नता होती है । लंका में जब प्रभु श्री हनुमानजी पहुँचे तो प्रभु ने पहले से बाल्यकाल में ही उन्हें श्री अग्निदेवजी से वरदान दिला दिया था कि अग्नि उनका बाल भी बाँका नहीं कर सकेगी और प्रभु श्री हनुमानजी अग्नि के प्रभाव से सदा के लिए सुरक्षित रहेंगे । प्रभु ने ऐसा इसलिए करवाया क्योंकि प्रभु को पता था कि प्रभु श्री हनुमानजी को लंका जलाना है । लंका जलाने की प्रेरणा भी प्रभु ने अशोक वाटिका में पेड़ पर बैठे और भगवती सीता माता के दर्शन कर चुकने के बाद त्रिजटा के मुँह से स्वप्न के रूप में प्रभु श्री हनुमानजी को दी । प्रभु श्री हनुमानजी की श्री पूं छ जलाने की बुद्धि भी प्रभु ने भगवती सरस्वती माता के द्वारा रावण को दी । जब प्रभु श्री हनुमानजी की श्रीपूंछ में आग लगाई गई और प्रभु श्री हनुम...