Skip to main content

28. आस्था हो तो प्रभु स्वयं पधारते हैं

अगर हमारे मन में प्रभु के लिए आस्था है तो प्रभु स्वयं उस आस्था को पूर्ण करने के लिए कोई भी कसर नहीं छोड़ते । हमारी आस्था को प्रभु पूर्ण रूप से निभाते हैं और उस आस्था को मजबूत करते हैं ।

एक बार की घटना है । एक राहगीर का रास्ते में एक्सीडेंट हो गया । उसे काफी चोट लगी और उसने आसपास के लोगों को पुकारा पर पुलिस के डर से कोई भी नहीं आया । अंत में लहूलुहान अवस्था में उसने प्रभु को पुकारा और प्रभु स्वयं मनमोहन नाम बनाकर आ गए । प्रभु ने उसे अस्पताल पहुँचाया, खर्चे के लिए रुपये दिए, डॉक्टर और दवाई के लिए व्‍यवस्‍था की और दो-तीन दिन सेवा करने के बाद जब वह ठीक हो गया तो प्रभु अंतर्ध्यान हो गए । इस बीच उसके बार-बार पूछने पर प्रभु ने अपना पता जरूर उसे बताया था कि मैं कहाँ रहता हूँ । तो ठीक होने के बाद जब वह व्यक्ति उस पते पर मनमोहन को खोजता हुआ गया तो एक मंदिर मिला जो कि प्रभु श्री मनमोहनजी का ही मंदिर था । अब उस व्यक्ति को समझते देर नहीं लगी कि यह तो साक्षात प्रभु ही थे जो मदद करने के लिए मनमोहन नाम बनाकर आए थे ।