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51. प्रभु से मांग

हम प्रभु से क्या मांगते हैं यह महत्वपूर्ण है । साधारण तौर पर लोग प्रभु से संसार के सुख, पुत्र, पौत्र, आरोग्य, धन, संपत्ति मांगते हैं । पर जिसका सत्संग के कारण विवेक जागृत हो गया है वह प्रभु से प्रभु के धाम जाने की मांग करता है और वहाँ प्रभु की सेवा मांगता है ।

एक राजा का जन्मदिन था इसलिए वह राज्य के कारागार में गया और सभी कैदियों से कहा कि जो चाहे मांग लो । एक कैदी बोला महीने भर के लिए एक साबुन नहाने के लिए मिलती है उसे दो करवा दें । दूसरे कैदी ने कहा कि ठंड में कंबल मोटी और बढ़िया मिल जाए । तीसरे ने कहा कि कारागार की जिस कोठरी में मुझे रखा है वह गंदी है उसका रंग रोगन कर दिया जाए । राजा ने खुशी-खुशी सब करने का आदेश दे दिया । इस तरह सब कैदी अपनी मांग रखते गए और प्रसन्न मुद्रा में राजा सबकी स्वीकृति देता रहा । एक अंतिम कैदी बचा, वह बहुत समझदार था । उसकी बारी आई तो उसने मांगा कि कारागार से मुक्त कर उसे राज दरबार की सेवा में ले लिया जाए । राजा अति प्रसन्न हुआ और उसे मुक्त करके अपने राज दरबार की सेवा में ले लिया । फिर राजा को अन्य कैदियों ने कहा कि हमें भी मुक्त करवा दें । राजा ने कहा कि तुमने जो मांगा मैंने दिया, अब तुम्हारी बारी खत्म हो चुकी है । ऐसे ही हम प्रभु से संसार की वस्तुओं को मांगते हैं जो प्रभु हमें दे देते हैं । पर हमें प्रभु से प्रभु के धाम में प्रभु की सेवा मांगनी चाहिए जो सपने में भी हम नहीं सोचते । क्या इससे ऊँ‍‍ची कोई मांग हो सकती है ? जरा विचार करके देखें ।