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07. सौभाग्य और दुर्भाग्य

जीवन में सौभाग्य को भी हम भोगते हैं और दुर्भाग्य को भी हम भोगते हैं । ऐसा क्‍यों होता है कि जीवन में सौभाग्य टिकता नहीं और दुर्भाग्य हमारा पीछा छोड़ता नहीं । सिद्धांत के तौर पर एक बात अगर हम स्वीकार करेंगे तो इसका उत्तर हमें मिल जाएगा । फिर जीवन में सौभाग्य हमारे साथ सदा स्थिर रहेगा और दुर्भाग्य हमारे जीवन में आने की हिम्मत भी नहीं करेगा । सिद्धांत यह है कि प्रभु जिसके जीवन में हैं वहीं सौभाग्य स्थिर है और प्रभु जिसके जीवन में नहीं है वहाँ दुर्भाग्य आकर स्थिर हो जाता है ।

इसका पौराणिक उदाहरण देखें तो यह तथ्य समझ में आएगा । प्रभु श्री रामजी को जब वनवास मिला और वे श्री अयोध्याजी को छोड़कर वन में गए तो श्री अयोध्याजी में दुर्भाग्य की होड़ लग गई । महाराज श्री दशरथजी का परलोक गमन हुआ । श्री भरतलालजी जब अपने गुरुजी के बुलावे पर अपने ननिहाल से श्री अयोध्याजी आए तो उन्‍हें श्री अयोध्याजी में भयंकर अपशगुन मिले और वह विरान और दुर्भाग्यग्रस्त जान पड़ी । फिर जब प्रभु श्री रामजी वनवास काल पूर्ण कर वापस श्री अयोध्याजी आए और उनका राजसिंहासन पर राज्याभिषेक हुआ तो श्री अयोध्याजी में सौभाग्य की होड़ लग गई । कोई दरिद्र, अज्ञानी, रोगी नहीं रहा । किसी की कम उम्र में मृत्यु नहीं हुई । सभी स्वस्थ, संपन्न, ज्ञानी, गुणी बनकर रहने लगे । यहाँ तक कि श्री अयोध्याजी के आसपास रहने वाले पशु पक्षी भी वैर भुलाकर संग रहने लगे । कभी अकाल नहीं पड़ा, कभी पानी की कमी नहीं हुई । धरती माता खूब अन्‍न देती, वर्षा जल से नदी सरोवर सदा भरे रहते । सूत्र के तौर पर यह समझना चाहिए कि अगर जीवन में सौभाग्य को स्थिर रखना है तो भक्ति करके जीवन में प्रभु को लाना पड़ेगा ।