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01. प्रभु के दो बड़े प्रण

प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में अपने आश्रित का योगक्षेम वहन करने का प्रण लिया है । योगक्षेम दो शब्दों से बना है योग एवं क्षेम । योग का यहाँ अर्थ है कि प्रभु कहते हैं कि उनकी शरण ग्रहण करने वाले को जिस भी चीज की जब भी जरूरत होगी प्रभु उसे उपलब्ध करवाएंगे । क्षेम का अर्थ है कि प्रभु कहते हैं कि उसकी शरण ग्रहण करने वाले के पास जो भी है प्रभु उसकी रक्षा करेंगे । यह दोनों कितने विलक्षण प्रभु के प्रण हैं कि जब भी जिस भी चीज की उसे जरूरत होगी वह प्रभु पहुँचाएंगे और जो उसके पास है प्रभु उसकी रक्षा करेंगे

एक संत एक तीर्थ में रहने वाले पंडितजी की एक सत्य कथा सुनाते थे । एक पंडितजी नियमित रूप से मंदिर में श्रीमद् भगवद् गीताजी का पाठ करते थे और जो भी चढ़ावा आ जाता था उससे अपना घर चलाते थे । एक बार ऐसा हुआ कि तीन दिन तक कोई चढ़ावा नहीं आया और घर का चूल्हा बंद हो गया । उनकी पत्नी जो उनके जैसे श्रद्धावाली नहीं थी वह बिगड़ गई कि आपके प्रभु ऐसा योगक्षेम वहन करते हैं । पंडितजी को भी पत्नी की बात सुनकर उस समय गुस्सा आ गया और वे रात को मंदिर गए और श्रीमद् भगवद् गीताजी में लिखे योगक्षेम शब्द को लाल स्याही से काट दिया । घर पहुँचे तो देखा कि घर का हर कमरा राशन से भरा हुआ है । गेहूँ, आटा, दाल, घी, तेल सब प्रचुर मात्रा में लगभग वर्ष भर चले इतना पड़ा था । उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा कि यह कहाँ से आया तो पत्नी ने कहा कि आप ही ने तो एक 8 से 10 वर्ष के बालक के मार्फत भिजवाया है । वह बालक पांच बैलगाड़ी में इतना सामान लेकर आया और बोला कि पंडितजी के पास एक यजमान आए हैं उन्होंने भेजा है । पंडितजी को समझते देर न लगी कि वह बालक प्रभु थे और प्रभु ने श्रीलीला कर दी । वे भागते हुए मंदिर वापस गए और श्रीमद् भगवद् गीताजी में लाल स्याही से काटे योगक्षेम शब्द को अपने आंसुओं से धो दिया ।