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03. भक्तों का हित करने का प्रभु का प्रण

प्रभु का प्रण है कि वे अपने भक्तों का सदा हित करते हैं । जो भक्तों के हित में होता है वही प्रभु करते हैं । कभी-कभी हम कुछ और चाहते हैं पर प्रभु कुछ और करते हैं पर यह निश्चित मानिए कि प्रभु वही करते हैं जिसमें उनके प्रिय भक्तों का हित होता है । हम अपने वर्तमान को देखकर भविष्य मांगते हैं पर प्रभु हमारे भविष्य को जानते हुए हमें वर्तमान देते हैं ।

श्री रामचरितमानसजी में देवर्षि प्रभु श्री नारदजी का एक प्रसंग आता है । प्रभु की माया से वे एक बार मोहित हुए और प्रभु की माया ने उन्हें मायानगरी, राजा, सुंदर राजकुमारी दिखलाई । सुंदर राजकुमारी से विवाह करने का मोह उनमें जगा और वे प्रभु के पास प्रभु जैसा रूप मांगने गए जिससे राजकुमारी मोहित होकर स्वयंवर में वरमाला उनके गले में डाल दे । एक पते की बात देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने प्रभु से की कि जिसमें उनका हित हो प्रभु वैसा करें । यह बात सुनकर प्रभु अति प्रसन्न हुए क्योंकि यह प्रभु के मन की बात थी । प्रभु ने उन्हें वानर रूप दे दिया जिसका देवर्षि प्रभु श्री नारदजी को पता नहीं चला । स्वयंवर हुआ और राजकुमारी ने उनकी तरफ देखा तक नहीं और वरमाला प्रभु के गले में डाल दी । देवर्षि प्रभु श्री नारदजी क्रोधित हो गए और प्रभु को ही श्राप दे दिया कि एक अवतार में उन्हें नारी का वियोग सहना पड़ेगा और वानर से मदद लेनी पड़ेगी । प्रभु ने श्री रामावतार में उस श्राप को पूर्ण किया । प्रभु ने जब अपनी माया समेटी तो न कोई नगर था, न राजा था, न राजकुमारी थी । तब देवर्षि प्रभु श्री नारदजी को पता चला कि यह सब प्रभु की माया थी और प्रभु उनकी भक्ति भाव को बचाने के लिए उन्हें गृहस्‍थ के चक्कर में नहीं डालना चाहते थे । देवर्षि प्रभु श्री नारदजी को बहुत पश्चाताप हुआ । प्रभु सदैव अपनी हर क्रिया से अपने भक्तों का परम हित करते हैं क्योंकि यह प्रभु का प्रण है ।