Skip to main content

41. नया जन्म

प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहा है कि कोई दुराचारी-से-दुराचारी, पापी-से-पापी भी अगर प्रभु के समक्ष सच्चा पश्चाताप कर लेता है और अपनी गलती को जीवन में नहीं दोहराने का संकल्प भी कर लेता है तो उसका उसी शरीर में मानो नया जन्म हो जाता है क्योंकि प्रभु उसे क्षमा कर देते हैं ।

एक चोर ने राजमहल में चोरी की और चोरी का माल जंगल में गाढ़ दिया । राजा के सिपाही उसके पीछे लग गए । इसलिए उनसे बचने के लिए वह चोर एक मंदिर में जहाँ सत्संग चल रहा था वहाँ जाकर बैठ गया । वहाँ संत कह रहे थे कि अगर हम पाप का सच्चा पश्चाताप प्रभु के समक्ष कर लेते हैं और पाप करना भविष्य में हमेशा के लिए छोड़ देते हैं तो मानो हमारा उसी शरीर में नया जन्म हो जाता है । उस चोर ने तुरंत मंदिर में प्रभु के सामने सच्चा पश्चाताप किया और दोबारा जीवन में कभी चोरी नहीं करने का संकल्प भी किया । सत्संग विश्राम हुआ और वह बाहर निकला तो सिपाहियों ने उससे पहचान कर पकड़ लिया और राजा के दरबार में पेश किया । राजा के पूछने पर चोर ने चोरी करने की बात से मना किया । तब राजा ने कहा कि इसके हाथ में गर्म लोहे की जंजीर रख दो अगर यह चोर हुआ तो इसका हाथ जल जाएगा । गर्म जंजीर रखने पर उस चोर का हाथ नहीं जला । राजा ने जिज्ञासावश पूछा कि तुम्हें मैंने माफ किया पर सच्ची बात तो बताओ । तो उस चोर ने कहा कि उसने ही चोरी की, चोरी का माल वह जंगल में बरामद करवा देगा । पर राजा ने पूछा कि फिर तुम्हारा हाथ क्यों नहीं जला ? तो चोर ने कहा कि प्रभु कृपा से इसी शरीर में मेरा नया जन्म हो गया है । उसने सत्संग की पूरी बात राजा को बताई और प्रभु का श्रीमद् भगवद् गीताजी में कहा वह उपदेश राजा को सुनाया ।